Bihar News: 10 साल में 5 करोड़ की सजावट का खेल! बिहार सचिवालय में VIP कमरों के नाम पर करोड़ों की मरम्मत, RTI ने खोली फाइलों की परतें , सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल

Bihar News: बिहार की सत्ता के केंद्र बिहार सचिवालय से एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, जिसने सरकारी खर्च और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Bihar Secretariat VIP Rooms Scandal 5 Crore Renovation Expos
बिहार में सरकारी खर्च पर सवाल!- फोटो : X

Bihar News: बिहार की सत्ता के केंद्र बिहार सचिवालय से एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, जिसने सरकारी खर्च और प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पिछले 10 वर्षों में वीआईपी कमरों की चमक-दमक बनाए रखने के नाम पर 5 करोड़ रुपये से अधिक की राशि खर्च कर दी गई, और यह पूरा मामला अब आरटीआई दस्तावेजों के जरिए उजागर हुआ है।

भवन निर्माण विभाग के रिकॉर्ड बताते हैं कि 2015 से 2025 के बीच 45 से अधिक विभागों, आयोगों और संवैधानिक संस्थानों में कुल 437 बार मरम्मत और रेनोवेशन के वर्क ऑर्डर जारी किए गए। इनमें मंत्री, वरिष्ठ अधिकारियों और संवैधानिक पदाधिकारियों के कक्ष प्रमुख रूप से शामिल रहे। हर साल नए सिरे से इंटीरियर बदलाव और VIP लुक अपग्रेड के नाम पर लाखों रुपये खर्च होते रहे।

सूत्रों के मुताबिक कई कमरों में तो 12 से 24 महीने के भीतर ही दोबारा मरम्मत कराई गई, जो सामान्य तकनीकी मानकों के बिल्कुल विपरीत माना जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी सरकारी भवन में पेंटिंग, फर्नीचर या फॉल्स सीलिंग जैसी संरचनाएं वर्षों तक चलती हैं, लेकिन यहां बार-बार रिपेयर ऑर्डर जारी होना वित्तीय अनुशासन पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि कई बिल राउंड फिगर में पास किए गए। कई विभागों में 2.5 लाख रुपये या उससे मिलते-जुलते समान आंकड़ों में एक साथ वर्क ऑर्डर जारी हुए, जिससे यह संदेह गहराता है कि खर्च वास्तविक जरूरत के आधार पर था या कागजों पर मैनेजमेंट के तहत तय किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार भवन निर्माण विभाग बिहार के अंतर्गत आने वाले विभिन्न विभागों जैसे ग्रामीण कार्य, पीएचईडी, परिवहन और आईटी में मंत्रियों और अधिकारियों के कमरों के लिए अलग-अलग समय पर लगातार रेनोवेशन कार्य कराए गए। कई जगह तो एक ही बाथरूम की मरम्मत साल में दो बार तक दर्ज की गई, जिस पर प्रति यूनिट 50 हजार से 1 लाख रुपये तक खर्च दिखाया गया। जानकारों का मानना है कि या तो एक ही काम को बार-बार फाइलों में दिखाकर भुगतान लिया गया, या फिर चयनित ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के लिए योजनाबद्ध तरीके से कामों को दोहराया गया। यह पैटर्न सार्वजनिक धन के दुरुपयोग की ओर स्पष्ट संकेत देता है।

दस्तावेजों में यह भी सामने आया है कि नए अधिकारी अक्सर अपनी पसंद के अनुसार कमरे का इंटीरियर बदलवाते हैं और इंजीनियरों पर निर्देशों के आधार पर तुरंत काम शुरू कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया में तकनीकी जांच और वास्तविक आवश्यकता का मूल्यांकन कई बार औपचारिकता मात्र बनकर रह जाता है। कुल मिलाकर यह मामला केवल मरम्मत या सौंदर्यीकरण का नहीं, बल्कि सरकारी खर्च में पारदर्शिता और जवाबदेही पर एक गंभीर सवाल है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय जांच होगी या फिर यह मामला भी फाइलों में ही दफन हो जाएगा।