नीतीश के सामने ललन सिंह को लालू यादव ने कहा गेट आउट... सरयू राय को देने लगे गंदी गंदी गालियां, जब दिल्ली में भूमिहार नेताओं पर भड़के राजद सुप्रीमो
लालू यादव से जुड़ा एक वाकया शिवानंद तिवारी ने अपने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए दावा किया है कि लालू ने ललन और सरयू राय से बदसलूकी की है.
Lalu Yadav abusing Lalan singh and Saryu Rai : बिहार की सियासत में लालू यादव, नीतीश कुमार, ललन सिंह, सरयू राय, शिवानंद तिवारी आदि कुछ ऐसे नाम हैं जो छात्र राजनीति की उपज माने जाते हैं. शुरुआती दौर में सबने एक साथ राजनीति की लेकिन बाद में सबकी राहें जुदा हो गई. वर्ष 1990 में जब लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने तब कुछ समय बाद नीतीश कुमार के साथ भी उनकी अनबन हो गई. यहां तक कि नीतीश कुमार के साथ के कुछ नेताओं के साथ लालू यादव ने एक बार गालीगलौज भी किया था. इसका खुलासा शिवानंद तिवारी ने किया है जो लालू यादव और नीतीश कुमार दोनों के साथ लंबे समय तक राजनीति किये. उन्होंने गुरुवार को अपने सोशल मीडिया पर किए एक पोस्ट में बताया है कि कैसे नीतीश के सामने ही लालू ने ललन सिंह को कमरे से बाहर निकलवा दिया था और सरयू राय को गाली देने लगे थे. संयोग से दोनों भूमिहार जाति से हैं. नीचे पढ़िए शिवानंद तिवारी का फेसबुक पर किया पोस्ट-
शिवानंद लिखते हैं - नीतिश कुमार की राजनीति की संपूर्ण यात्रा को दो खंड में देखा जा सकता है. पहला खंड वह है जब वे सत्ता के बाहर थे. विधानसभा सदस्य वे 1985 में बने. उसके बाद तो उनकी राजनीति सरपट दौड़ी. 1989 में बाढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद बने. 1990 में वीपी सिंह की सरकार में कृषि और सहकारिता राज्यमंत्री बने. वह सरकार सिर्फ़ पंद्रह महीने ही चल पाई. 1991 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव में नीतीश जी पुनः बाढ़ से सांसद बने. इस बीच 1990 में लालू यादव मुख्यमंत्री बन चुके थे. मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू किए जाने के समर्थन में उनके अभियान और आडवाणी जी की गिरफ़्तारी से उनकी लोकप्रियता आसमान छू रही थी. हालाँकि उस अभियान में लालू यादव के साथ नीतीश कुमार सहित हम सब लोग सक्रिय थे.
1991 की लोकसभा चुनाव के तुरंत बाद की एक चर्चित घटना है। चर्चित इस अर्थ में कि कई लोगों ने उस घटना के बारे में अपने-अपने तरीके से लिखा है. संकर्षण ठाकुर की किताब में शायद वह घटना सबसे पहले आई थी. मैंने उसको पढ़ा नहीं है. लेकिन वह घटना लालू और नीतीश दोनों के मिज़ाज और चरित्र को ज़रूर दर्शाती है. 91 के मध्यावधि चुनाव में वृष्णि पटेल भी सिवान संसदीय क्षेत्र से चुनाव जीतकर लोकसभा आए थे। बिहार भवन में उनको कमरा मिला था. दिल्ली में उन दिनों मेरा मुकाम नीतीश का ही घर हुआ करता था. जिस दिन की यह घटना है, उस दिन हम लोग यानी नीतिश कुमार, ललन सिंह, वृष्णि पटेल और मैं—पटेल साहब के कमरे में टेलीविजन पर कोई फिल्म देख रहे थे। फिल्म समाप्त होने के बाद जब हम बाहर निकले, तो पता चला कि लालू जी भी दिल्ली आ गए हैं और नीचे मुख्यमंत्री कक्ष में हैं। नीतिश कुमार ने ही कहा कि चलिए, मुख्यमंत्री जी से मिल लिया जाए। लेकिन ललन पता नहीं क्यों जाने को इच्छुक नहीं थे.
नीतीश ने कहा कि 'अरे चलिए. ऐसा क्या है.' लेकिन तब भी ललन जाने में संकोच कर रहे थे। तब मैंने ललन सिंह से कहा कि जब नेता कह रहा है तो चलो , क्या हर्ज है। मैंने नीतीश के लिए नेता शब्द का इस्तेमाल किया है. हम लोग नीतीश को ही अपनी जमात का नेता मानते थे. यह जयप्रकाश आंदोलन और लोहिया विचार मंच के जमाने से ही था. हम लोग मुख्यमंत्री कक्ष के ड्राइंग रूम में पहुँचे। वहाँ देखा कि तीन लोगों के बैठने वाले लंबे सोफे पर बीच में लालू यादव बैठे हुए हैं। सामने एक लंबा टेबल था, जिस पर एक खुली हुई फाइल रखी थी. फाइल में सिर्फ़ एक पन्ना नज़र आ रहा था. लालू यादव के हाथ में खुली हुई कलम थी. नज़र फाइल पर. लालू ने हम लोगों पर नज़र भी नहीं उठाई.
हम लोग अंदर गए और जिसे जहाँ जगह मिली, वहाँ बैठ गए या खड़े हो गए। एक दूसरा लंबा सोफा था. नीतीश और पटेल साहब उस पर बैठ गए। सामने एक गोदरेज की टेबल थी, जिस पर टेक लगाकर ललन खड़े हो गए. मैं लालू यादव के बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गया।
लालू यादव ने बग़ैर कुछ कहे, अपनी कलम बंद की, फाइल को एक तरफ रखा और सीधे ललन की ओर देखा और उंगली के इशारे से उसको कमरे से बाहर का रास्ता दिखाया.सब लोग हतप्रभ हो गए। ललन भी पहले उस इशारे को नहीं समझ पाए. तब लालू ने दोबारा उनको बाहर जाने का इशारा किया. ललन चुपचाप सिर झुकाकर वहां से बाहर निकल गए। मैंने नीतिश कुमार और पटेल साहब के चेहरे की ओर नजर उठाई. ललन के साथ इस व्यवहार को देखकर दोनों का चेहरा उतर गया था. ललन अपनी मर्जी से लालू के यहां नहीं गया था. एक तरह से नीतीश ही दबाव देकर उनको वहां ले गए थे.
इसके बाद लालू यादव ने सरयू राय का नाम लेकर गाली गलौज करना शुरू कर दिया। लालू सरयू राय को क्यों गलिया रहे हैं हम लोग इससे बिल्कुल अनभिज्ञ थे. बाद में पता चला कि राय जी ने पटना के नवभारत टाइम्स में एक लेख लिखा था. उन्होंने लालू सरकार पर आरोप लगाया था कि बिहार के हित के विरुद्ध इसने सोन नहर के पानी को भारत सरकार के तत्कालीन बिजली मंत्री कल्पनाथ राय के क्षेत्र में दे दिया है. विधानसभा का सत्र चल रहा था. विपक्ष ने उस खबर पर विधानसभा में शोरशराबा मचाया था. सरयू राय , नीतीश कुमार के मित्र हैं. इसी पृष्ठभूमि में लालू यादव अत्यंत आक्रोश में थे और सरयू राय के खिलाफ अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी की कृपा से राजनीति नहीं कर रहे हैं। मैं जानता हूँ कि यह सब कौन करा रहा है. उनका इशारा नीतीश कुमार की ओर था.
यह सब सुनकर मेरे धैर्य का बांध टूट गया। मैंने खड़े होकर कहा कि आपको यह गलतफहमी हो गई है कि बाकी लोग आपकी कृपा से राजनीति कर रहे हैं। मैंने उन्हें उनके पुराने दिनों की याद दिलाई और कहा कि मेरे जीप पर पीछे लटकने के लिए बेचैन रहते थे. वह दिन भूल गये! मैंने नीतीश को कहा उठो , इस आदमी के साथ बैठना अपना अपमान करवाना है. ग़ुस्से से मेरी आवाज़ काँप रही थी. नीतीश और पटेल साहब उठकर खड़े हो गए.
लालू मुझे अपने स्कूल के दिनों से जानते थे. मेरी इस प्रतिक्रिया से स्थिति अचानक बदल गई। लालू यादव तुरंत उठे, मुझे पकड़कर शांत करने लगे और बाहर आवाज लगाई—“अरे कहाँ मर गया सब. जल्दी बाबा के लिए चाय ले आओ. दूसरी ओर नीतीश को कहा, बैठिए नीतीश जी, बाबा चाय पी कर जायेंगे. नीतीश ठस से बैठ गए. चाय आई. अब चाय गले के नीचे उतर रही है! किसी तरह चाय गले से नीचे उतार कर हम लोग वहाँ से बाहर निकले.बिहार भवन के बिलकुल नज़दीक ही नीतीश कुमार का सरकारी आवास था. वातावरण गंभीर था. घर पहुंचते ही नीतीश कुमार ने अपने स्टाफ़ को आदेश दिया कि किसी का फोन नहीं देना है. किसी से मिलना नहीं है. पटना सरयू राय को फोन लगाइए. राय जी को फोन गया कि शाम जहाज़ से दिल्ली पहुँचिये.
शाम तक राय जी दिल्ली हाज़िर हो गए. पूरी घटना पर चर्चा हुई. तय हुआ कि बिहार भवन में जो कुछ भी हुआ उसके विरोध में लालू यादव को कड़ी चिट्ठी लिखी जाए. राय जी चिट्ठी का मज़मून तैयार करें. दो ढाई पेज का मज़मून राय जी ने तैयार किया. नीतीश कुमार ने राय जी को सुझाया कि इसको थोड़ा छोटा कर दें. राय जी ने फिर लिखने में हाथ लगाया. इधर नीतीश ने कहा कि वे शरद जी से मिल आते हैं. मैंने कहा कि शरद जी से मिलने जाओगे तब तो चिट्ठी नहीं जाएगी. नीतीश जी ने झुंझला कर जवाब दिया कि शरद जी नेता हैं. उनसे क्यों नहीं मिलें. मैंने जवाब दिया कि ज़रूर मिलो. मैं तो सिर्फ़ उस मुलाक़ात के नतीजे की बात कर रहा हूँ. नीतीश शरद जी से मिल कर आये. इस बीच राय जी ने ढाई पेज को डेढ़ पेज में संक्षिप्त कर दिया था. नीतीश जी ने कहा कि इसको और छोटा कर दीजिए. इसको पटना पहुँचने के बाद लालू जी को भेजा जाएगा. अंततोगत्वा समझा जाए कि उस चिट्ठी का कोई औचित्य नहीं रहा. लेकिन वह मूल चिठ्ठी छपी हुई है, श्री कांत की किताब 'चिठ्ठियों की राजनीति' में. यह प्रसंग यही समाप्त करता हूँ.