नीतीश के सीएम पद से इस्तीफे के पहले जदयू में बड़ी रणनीति बना रहे निशांत, टीम तैयार, नेताओं और जातियों को ऐसे साधेंगे

पापा नीतीश के नक्शेकदम पर चलते हुए निशांत ने बिहार में जदयू को मजबूती देने के लिए खास रणनीति तैयार कर ली है. इसमें वे साथ कई मोर्चों पर काम कर रहे हैं.

Nishant Kumar son of Nitish Kumar
Nishant Kumar son of Nitish Kumar- फोटो : news4nation

Nishant : बिहार की सियासत में इन दिनों बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। नीतीश के सीएम पद छोड़ने के पहले जदयू में टूट या नेताओं किसी प्रकार का असंतोष रोकने को निशांत पूरी तरह से एक्टिव हो गए हैं। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 12 अप्रैल को राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं। इस संभावित फैसले ने जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के भीतर हलचल बढ़ा दी है। पार्टी के कई विधायक, एमएलसी और वरिष्ठ नेताओं में नाराजगी की खबरें सामने आ रही हैं, जिससे अंदरूनी गुटबाजी को भी हवा मिल रही है।


इसी बीच, नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार ने पार्टी को एकजुट रखने की जिम्मेदारी संभालनी शुरू कर दी है। पिछले कुछ दिनों में निशांत ने दर्जनों जदयू नेताओं से मुलाकात की है। इन बैठकों में वे नेताओं को भरोसा दिला रहे हैं कि नीतीश के दिल्ली जाने के बाद भी बिहार में जदयू कमजोर नहीं होगी।


टीम निशांत का गठन 

इस राजनीतिक सक्रियता के साथ ही “टीम निशांत” का गठन भी किया गया है, जिसमें करीब 14 युवा विधायक शामिल हैं। ये सभी 32 से 36 वर्ष आयु वर्ग के हैं और अधिकांश राजनीतिक परिवारों से आते हैं। टीम में रुहेल रंजन (इस्लामपुर), ऋतुराज कुमार (घोषी), कोमल सिंह (गायघाट), चेतन आनंद (नवीनगर), शुभानंद मुकेश (कहलगांव), अतिरेक कुमार (कुशेश्वर स्थान), विशाल (नरकटिया), मांजरिक मृणाल (वारिसनगर), समृद्ध वर्मा (सिकटा), नचिकेता मंडल (जमालपुर) राहुल कुमार सिंह (डुमरांव), आदित्य कुमार (सकरा), वशिष्ठ सिंह (करगहर) और अभिषेक आनंद (चेरिया बरियारपुर) जैसे युवा चेहरे शामिल हैं। 


टीम में जातियों का समीकरण भी 

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह टीम भविष्य में जदयू के नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार करने की रणनीति का हिस्सा है। निशांत ने अपने पिता की तरह एक कोर टीम बनाकर यह संकेत दिया है कि वे धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहते हैं।  इस टीम की खासियत इसकी सोशल इंजीनियरिंग है, जिसमें विभिन्न जातीय समीकरणों का ध्यान रखा गया है कुर्मी, राजपूत, भूमिहार, कायस्थ, दलित और अति पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया है।

कोर वोटरों को एकजुट रखना जरूरी 

फिलहाल जदयू के पास बिहार में 85 विधायक और 12 सांसद हैं, जबकि पार्टी का लगभग 16% स्थायी वोट बैंक माना जाता है। यही आधार जदयू की ताकत है, जिसे बनाए रखना अब निशांत के सामने सबसे बड़ी परीक्षा होगी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि यदि निशांत कुमार पार्टी को एकजुट रखने में सफल रहते हैं, तो आने वाले समय में उन्हें संगठन या सरकार में बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। वे खुद को एक कुशल नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहे हैं।

भाजपा का बन सकता है सीएम 

नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के फैसले के साथ ही बिहार में सत्ता परिवर्तन की अटकलें भी तेज हो गई हैं। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) मुख्यमंत्री पद का दावा पेश कर सकती है। इस परिस्थिति में जदयू के लिए अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि नीतीश कुमार के बाद जदयू की कमान किस तरह से संभाली जाती है और क्या निशांत कुमार पार्टी के नए चेहरे के रूप में उभर पाते हैं या नहीं।