नीतीश की 'माफी' या बीजेपी को चुनौती? मोदी के पोस्टर पर कालिख पोतने वाले को CM आवास में एंट्री, सियासी भूचाल!
बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने पार्टी से निष्कासित नेता अभय पटेल से मुलाकात कर सबको चौंका दिया है। क्या यह बीजेपी को चुनौती है या जेडीयू का डैमेज कंट्रोल? पढ़ें पूरी रिपोर्ट।
Patna - बिहार की सियासत में 'नीति' और 'अनीति' के खेल के बीच एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जिसने गठबंधन की मर्यादा और पार्टी के अनुशासन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस नेता को जेडीयू ने पीएम मोदी के विरोध के कारण 'अछूत' घोषित किया था, आज उसी के लिए मुख्यमंत्री आवास के दरवाजे खुल गए हैं।
प्रदेश अध्यक्ष के फैसले की 'धज्जियां'
पहला और सबसे बड़ा सवाल जेडीयू के भीतर सत्ता के केंद्र को लेकर है। बीते 19 मार्च को प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने जिस अभय पटेल को 3 साल के लिए दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंका था, उसे खुद नीतीश कुमार ने 1 अप्रैल को बुलाकर गले लगा लिया। यह केवल एक मुलाकात नहीं, बल्कि प्रदेश नेतृत्व के फैसले पर नीतीश कुमार का खुला 'वीटो' है, जो बताता है कि पार्टी में संगठन से बड़ा व्यक्ति होता है।
बीजेपी विरोध को नीतीश का 'मौन समर्थन'?
अभय पटेल का गुनाह यह था कि उन्होंने जेडीयू दफ्तर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पोस्टर पर कालिख पोती थी। गठबंधन की राजनीति में यह एक गंभीर अपराध माना गया, लेकिन नीतीश कुमार की इस मुलाकात ने अब नई थ्योरी को जन्म दे दिया है। क्या नीतीश कुमार अपने कार्यकर्ताओं के मन में पल रहे बीजेपी विरोध को दबे पांव सह दे रहे हैं? यह मुलाकात बीजेपी के लिए एक साफ संदेश है कि जेडीयू अपनी शर्तों पर राजनीति करेगी।
राज्यसभा जाने से पहले 'किलाबंदी'
सियासी गलियारों में चर्चा तेज है कि नीतीश कुमार जल्द ही राज्यसभा जा सकते हैं। ऐसे में दिल्ली कूच करने से पहले नीतीश बिहार जेडीयू की चूलें कस रहे हैं। वे नहीं चाहते कि उनके जाने के बाद पार्टी का कैडर और वफादार कार्यकर्ता नेतृत्व की सख्ती से नाराज होकर छिटक जाए। अभय पटेल जैसे जमीन से जुड़े चेहरों को वापस लाकर नीतीश 'लव-कुश' समीकरण और अपने आधार वोट बैंक को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं।
डैमेज कंट्रोल या नई जंग की शुरुआत?
इस मुलाकात के बाद अभय पटेल का यह कहना कि "खास बात कल जदयू कार्यालय में करेंगे", इशारा करता है कि उनके निष्कासन को रद्द करने की स्क्रिप्ट लिखी जा चुकी है। अगर ऐसा होता है, तो यह जेडीयू के भीतर मचे अंतर्कलह को शांत करने का एक प्रयास होगा, लेकिन एनडीए गठबंधन के भीतर यह एक नई रार का कारण बन सकता है। क्या बीजेपी अपने सबसे बड़े नेता के अपमान को भूलकर इस 'घर वापसी' को स्वीकार करेगी?
सत्ता के शीर्ष से 'अधिकार' की लड़ाई
कुल मिलाकर, नीतीश कुमार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे भले ही गठबंधन में हों या दिल्ली जाने की तैयारी में, बिहार जेडीयू की कमान आज भी उन्हीं के हाथ में है। उमेश कुशवाहा जैसे अध्यक्ष केवल आदेश जारी करते हैं, लेकिन उस पर अंतिम मुहर 1-अणे मार्ग ही लगाता है। नीतीश का यह 'माफीनामा' आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति की दिशा और दशा तय करेगा।
रिपोर्ट - देबांशु प्रभात