Women Representation on NDA vs Opposition: सत्ता और विपक्ष आमने-सामने, संसद में सियासी भूचाल, पढ़िए किस पार्टी में कितनी है महिलाओं की है भागेदारी
Women Representation on NDA vs Opposition: केंद्र के नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संसद का विशेष सत्र अप्रैल 2026 सरकार ने तीन अहम विधेयकों के साथ जो विशेष सत्र बुलाया था, उसमें सबसे चर्चित महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया।...
Women Representation on NDA vs Opposition: नई दिल्ली की सियासी फिज़ा में इन दिनों जबरदस्त हलचल है। केंद्र के नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संसद का विशेष सत्र अप्रैल 2026 सरकार ने तीन अहम विधेयकों के साथ जो विशेष सत्र बुलाया था, उसमें सबसे चर्चित महिला आरक्षण बिल लोकसभा में गिर गया। यह नतीजा न सिर्फ सत्ता पक्ष के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, बल्कि विपक्ष के लिए इसे सियासी जीत के तौर पर पेश किया जा रहा है।
लोकसभा में यह बिल 298 के मुकाबले 230 वोटों से गिरा, जबकि इसे पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी था। यह असफलता अब संसद से निकलकर पूरे देश के सियासी माहौल में बहस का मुद्दा बन चुकी है जहां एक तरफ सरकार विपक्ष पर आरोप लगा रही है, वहीं विपक्ष सरकार की नीयत और रणनीति पर सवाल खड़े कर रहा है। इस बिल के लागू होने से संसद और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 33 फीसदी तक आरक्षित हो जाती। मौजूदा आंकड़े बताते हैं कि 18वीं लोकसभा में 543 सांसदों में केवल 75 महिला सांसद हैं, जबकि राज्यसभा में यह संख्या 42 है। यानी कुल मिलाकर संसद में महिलाओं की मौजूदगी अभी भी अपेक्षित स्तर से काफी नीचे है।
राजनीतिक दलों के हिसाब से देखें तो भारतीय जनता पार्टी की महिला सांसदों की संख्या सबसे ज्यादा है, जबकि कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य दल इसके बाद आते हैं। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि टिकट वितरण और सत्ता में भागीदारी का ढांचा असली तस्वीर बयान करता है।
लोकतांत्रिक सुधार संघ (एडीआर) की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 लोकसभा चुनाव में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी सिर्फ 9.6 फीसदी रही, जो लोकतांत्रिक भागीदारी पर गंभीर सवाल खड़े करती है। कई सीटों पर तो राजनीतिक दलों ने महिलाओं को टिकट तक नहीं दिया, जो इस असंतुलन को और गहरा करता है।
भारत महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में अभी भी पीछे माना जाता है, जहां वैश्विक औसत 26.9 फीसदी है। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़े भी यही बताते हैं कि कई देशों में महिलाएं राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख के तौर पर काम कर रही हैं, जबकि भारत में यह बहस अभी भी आरक्षण के स्तर पर अटकी हुई है। इसी बीच 2026 में होने वाले बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर भी सियासी हलचल तेज है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में टीएमसी, बीजेपी और कांग्रेस सभी ने महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है, लेकिन प्रतिशत अभी भी सीमित है। इससे यह साफ है कि महिला प्रतिनिधित्व का मुद्दा सिर्फ संसद तक सीमित नहीं, बल्कि राज्यों की सियासत में भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या महिला आरक्षण बिल की यह हार एक अस्थायी झटका है या फिर भारतीय राजनीति में समान भागीदारी की लड़ाई और लंबी होने वाली है? राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि यह सिर्फ एक विधेयक की हार नहीं, बल्कि आने वाले चुनावी समीकरणों की नई शुरुआत है जहां हर दल को अपनी रणनीति फिर से तय करनी होगी। फिलहाल संसद की यह बहस एक सियासी संदेश दे रही है कि भारत की लोकतांत्रिक बिसात पर अभी भी कई अधूरे इंकलाब बाकी हैं, और महिला भागीदारी उनमें सबसे अहम मोर्चा बनी हुई है।