बिहार का अनोखा मंदिर: जहाँ गुरु गोरखनाथ ने किया था प्रवास, जानिए गोरखरी धाम की पौराणिक स्थल की पूरी गाथा

क्या आप जानते हैं कि बिक्रम प्रखंड का गोरखरी ग्राम कभी महायोगी गुरु गोरखनाथ की तपस्थली रहा है? यहाँ आज भी बाबा का सिद्धपीठ है, जहाँ से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। इतना ही नहीं, यहाँ मुगल काल की विखंडित, कोणार्क शैली की बेहद प्राचीन सूर्य प्रतिमा भी है,

Historical Places in Patna Guru Gorakhnath Siddhpeeth Bihar
पटना के ऐतिहासिक धार्मिक स्थल गुरु गोरखनाथ सिद्धपीठ- फोटो : Reporter

पटना जिले का बिक्रम प्रखंड ऐतिहासिक, पौराणिक और सांस्कृतिक दृष्टि से एक बेहद समृद्ध क्षेत्र है। बिक्रम प्रखंड इतिहास के पन्नों में एक ऐसी पवित्र स्थली है जहाँ नाथ संप्रदाय का योग, प्राचीन सूर्य उपासना (छठ), और महान विद्वानों का ज्ञान एक साथ आकर मिलते हैं। यह स्थान बिहार के गौरवशाली इतिहास का एक चमकता हुआ हिस्सा है। यह इलाका सिर्फ खेती-किसानी के लिए ही नहीं, बल्कि प्राचीन काल के महान ऋषियों, महायोगियों और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं की जीवंत भूमि रहा है। 


'रामचरण पुर' से आज के गोरखरी तक

जैसा कि इतिहास और स्थानीय मान्यताओं में दर्ज है, 'रामचरण पुर' (जो आज गोरखरी ग्राम है) नाथ संप्रदाय का एक बड़ा केंद्र रहा है। स्वयं गुरु गोरखनाथ ने अपने शिष्यों (बाबा गंभीरनाथ और कण्हपा) के साथ यहाँ प्रवास किया और ध्यान लगाया था। ब्रिटिश काल में इस गाँव की जमींदारी नीलाम होने से बचाने की चमत्कारी लोककथा आज भी यहाँ के बुजुर्ग सुनाते हैं। यहाँ धार्मिक कार्यों में बाबा के 'लकड़ी के पीढ़े' को पूजने की अनूठी परंपरा है। यह क्षेत्र केवल आध्यात्मिक रूप से ही नहीं, बल्कि बौद्धिक रूप से भी बेहद समृद्ध रहा है। गोरखरी के ही रहने वाले डॉ. रामचंद्र प्रसाद जैसी महान विभूतियों ने, जिन्होंने रामायण और ओशो के साहित्यों का अंग्रेजी में अनुवाद कर भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर पहुँचाया, इसी मिट्टी से प्रेरणा ली थी। 

महान योगी और भगवान शंकर के अवतार माने जाने वाले गुरु गोरखनाथ पूरे संसार में विख्यात हैं। विशेषकर भारत में उनकी लोकप्रियता और आध्यात्मिक प्रभाव इतना गहरा है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं गोरखपुर के प्रसिद्ध गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर हैं। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, गुरु गोरखनाथ जी ने सन 845 से 970 ईस्वी तक पूरे भारत का भ्रमण किया और अपने चमत्कार, सिद्धि व योग के माध्यम से लोगों के कष्टों को दूर किया। उनके द्वारा स्थापित 'नाथ संप्रदाय' का प्रभाव केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि नेपाल से लेकर अरब देशों तक आज भी इसके चिन्ह और प्रभाव देखे जा सकते हैं।

पाटलिपुत्र आगमन और ऐतिहासिक गोरखरी ग्राम की स्थापना

नवनाथ और 84 सिद्धों की गौरवशाली परंपरा से निकले अनेक महायोगियों ने देश भर में नाथ संप्रदाय के विचारों का प्रचार-प्रसार किया। इसी यात्रा के दौरान गुरु गोरखनाथ अपने प्रसिद्ध शिष्यों के साथ पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना के आसपास का क्षेत्र) पधारे थे। माना जाता है कि उस समय के 'रामचरण पुर', जिसे आज 'गोरखरी ग्राम' के नाम से जाना जाता है, में उन्होंने अपना डेरा डाला था। तत्कालीन समय में गोरखरी एक छोटा लेकिन बेहद समृद्ध गांव था, जहां के निवासी अत्यंत अतिथि-प्रिय, धार्मिक और साधु-संतों का हृदय से सम्मान करने वाले थे।


सिद्ध शिष्यों का पड़ाव और गोरखरी की चमत्कारी लोककथाएं

गुरु गोरखनाथ जी ने अपने गोरखरी प्रवास के दौरान जिस पवित्र स्थल पर ध्यान और आसन लगाया था, वह स्थान आज एक भव्य गोरखनाथ मंदिर के रूप में सुशोभित है। उनके साथ आए शिष्यों में से बाबा गंभीरनाथ ने 'अराप ग्राम' में आसन लगाया, जिसे आज 'गंभीर स्थान मंदिर' के रूप में पूजा जाता है, जबकि दूसरे शिष्य कण्हपा के चुने स्थान को आज 'कनपा' के नाम से जाना जाता है। गोरखरी में आज भी किसी भी धार्मिक कार्य में बाबा गोरखनाथ को लकड़ी का आसन (पीढ़ा) समर्पित करने की अटूट परंपरा है। यहाँ तक कि ब्रिटिश काल की एक मशहूर कथा के अनुसार, जब गोरखरी की जमींदारी नीलाम होने वाली थी, तब एक रहस्यमयी योगी ने अचानक प्रकट होकर इसे बचाया था, जिसके बाद से गोरखरी खुद अपना जमींदार रहा।

विद्वानों की आस्था और मंदिर का आधुनिक जीर्णोद्धार

गोरखरी के इस सिद्ध पीठ की महिमा को केवल स्मरण मात्र से ही महसूस किया जा सकता है। ओशो की पुस्तकों और रामायण का अंग्रेजी अनुवाद करने वाले गोरखरी के विख्यात विद्वान डॉ. रामचंद्र प्रसाद अक्सर अपने संस्मरणों में बाबा गोरखनाथ के चमत्कारों का जिक्र करते थे। कालांतर में जब मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ, तब डॉ. प्रसाद ने ही बाबा गोरखनाथ की विशेष प्रतिमा बनारस से बनवाकर यहाँ स्थापित करवाई थी। वर्तमान में भी इस सिद्धपीठ की सेवा का क्रम जारी है, जहाँ क्षेत्र के प्रसिद्ध उद्योगपति और धर्मप्राण व्यक्ति धर्मदेव सिंह ने मंदिर को एक सुंदर तालाब समर्पित किया है और वे निरंतर तन, मन, धन से इसकी सेवा में तत्पर रहते हैं।


मनोकामना पूर्ण करने वाला सिद्धपीठ और ऐतिहासिक सूर्य प्रतिमा का रहस्य

आज गोरखरी का यह गोरखनाथ धाम एक जागृत सिद्धपीठ के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है, जहाँ से कोई भी जरूरतमंद खाली हाथ नहीं लौटता। इसी परिसर के समीप भगवान सूर्य की एक अत्यंत प्राचीन पाषाण प्रतिमा भी स्थापित है, जो कोणार्क शैली में निर्मित है। हालांकि मुगल काल के दौरान इस बहुमूल्य प्रतिमा को विखंडित करने का प्रयास किया गया था, लेकिन हजारों वर्ष पुरानी यह मूर्ति आज भी देव के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर की प्रतिमा के समान ही पुरातात्विक महत्व रखती है, जहाँ प्रतिवर्ष छठ पूजा के अवसर पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि अमर गुरु गोरखनाथ आज भी अदृश्य रूप में यहाँ आने वाले हर भक्त की पुकार सुनते हैं।

रिपोर्ट - ऋषिकेश  कुमार