महावीरी जुलूस पर हाईकोर्ट की दो टूक,कहा- धार्मिक आजादी के साथ कानून-व्यवस्था भी जरूरी
पटना हाईकोर्ट ने सीवान जिले के हथौड़ा गांव के अखाड़ा नंबर-1 के महावीरी जुलूस को लेकर अहम टिप्पणी की है।..
पटना हाईकोर्ट ने सीवान जिले के हथौड़ा गांव के अखाड़ा नंबर-1 के महावीरी जुलूस को लेकर अहम टिप्पणी की है। कोर्ट ने साफ कहा कि भारत में धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है और राज्य को सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान का रवैया रखना चाहिए। धार्मिक जुलूस निकालना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(बी) और अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित अधिकार है, लेकिन यह अधिकार निरंकुश या असीमित नहीं हो सकता।जस्टिस आलोक कुमार की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ सार्वजनिक व्यवस्था और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। यदि किसी धार्मिक आयोजन से शांति और सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ने की आशंका हो, तो प्रशासन उचित और तर्कसंगत प्रतिबंध लगा सकता है।
मामला सीवान के हथौड़ा गांव के अखाड़ा नंबर-1 से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि 1958 से हर साल भाद्रपद कृष्ण पक्ष की 11वीं तिथि को महावीरी जुलूस निकालने के लिए अखाड़ा नंबर-1 को लाइसेंस मिलता रहा है।याचिकाकर्ता के मुताबिक वर्ष 2012 और 2013 में करीब 200 श्रद्धालुओं को जुलूस में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद पुलिस ने धीरे-धीरे अनुमति प्राप्त लोगों की संख्या कम कर दी। वर्ष 2014 में यह संख्या 150, 2015 में 100 और वर्ष 2023 से महज 5 श्रद्धालुओं तक सीमित कर दी गई।
याचिकाकर्ता ने पारंपरिक मार्ग बदले जाने पर भी आपत्ति जताई और संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हवाला दिया। उनका आरोप था कि प्रशासन की कार्रवाई से लंबे समय से चली आ रही धार्मिक परंपरा प्रभावित हुई है।
याचिकाकर्ता की ओर से सीवान के एसडीपीओ की 31 अक्टूबर 2024 की रिपोर्ट पर भी सवाल उठाया गया। आरोप था कि रिपोर्ट में कई अखाड़ों से जुड़े लोगों को एक साथ जोड़कर कानून-व्यवस्था की स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया।याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि उसी मार्ग पर करीब एक हजार लोगों के लाठी, भाला और तलवार वाले दूसरे जुलूस की अनुशंसा की गई थी। ऐसे में अखाड़ा नंबर-1 के जुलूस को सिर्फ पांच लोगों तक सीमित करना भेदभावपूर्ण रवैया है।
राज्य सरकार की ओर से अदालत में अलग तस्वीर पेश की गई। सरकार ने बताया कि वर्ष 2015 से 2022 के बीच भले ही पांच लोगों को जुलूस की अनुमति दी गई थी, लेकिन मौके पर 1700 से 2000 लोग तक जुट जाते थे। इससे कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती थी और कई मामले भी दर्ज हुए।सरकार ने वर्ष 2024 की घटना का भी हवाला दिया। बताया गया कि महावीरी जुलूस के दौरान बीडीओ की सरकारी गाड़ी में आग लगा दी गई थी और पुलिस पर पथराव हुआ था। ऐसे घटनाक्रम को देखते हुए प्रशासन के लिए जुलूस में शामिल लोगों की संख्या सीमित करना जरूरी था।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है, लेकिन इसका अर्थ असीमित स्वतंत्रता नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि स्वतंत्रता पर कोई सीमा न हो तो इसका दुरुपयोग समाज के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसलिए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में जुलूस को हमेशा के लिए केवल पांच लोगों तक सीमित रखने की आशंका अभी काल्पनिक है। आने वाले समय में अनुमति कितने लोगों को मिलेगी, यह उस समय की वास्तविक कानून-व्यवस्था की स्थिति और प्रशासनिक आकलन पर निर्भर करेगा।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी से साफ है कि धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ सार्वजनिक शांति और सुरक्षा को भी बराबर महत्व दिया जाएगा। यानी धार्मिक जुलूस निकालने का हक संवैधानिक है, लेकिन कानून-व्यवस्था की कसौटी पर प्रशासन को उचित सीमा तय करने का अधिकार भी हासिल है।