बिहार पुलिस की नाकामी : पटना हाईकोर्ट ने मनरेगा इंजीनियर हत्याकांड के सभी दोषियों को किया बरी, जांच को बताया थर्ड क्लास

पटना हाईकोर्ट ने मनरेगा इंजीनियर उज्ज्वल राज हत्याकांड में सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने बिहार पुलिस की लचर जांच और ट्रायल जज की कार्यप्रणाली पर कड़ी फटकार लगाई है।

बिहार पुलिस की नाकामी : पटना हाईकोर्ट ने मनरेगा इंजीनियर हत्

Patna - : बिहार की राजधानी पटना से लेकर शेखपुरा तक सनसनी फैलाने वाले मनरेगा जूनियर इंजीनियर उज्ज्वल राज हत्याकांड में पटना हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक और पुलिसिया जांच की धज्जियां उड़ाने वाला फैसला सुनाया है। जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्रशेखर झा की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए सभी पांचों अभियुक्तों को साक्ष्यों के अभाव और जांच की गंभीर त्रुटियों के आधार पर बाइज्जत बरी कर दिया है। कोर्ट ने इस फैसले के जरिए न केवल बिहार पुलिस की 'थर्ड क्लास' जांच पर सवाल उठाए हैं, बल्कि ट्रायल कोर्ट के जज की कार्यप्रणाली पर भी बेहद तल्ख टिप्पणी की है।

फर्जी प्रविष्टि से इनकार पर हुई थी हत्या, पुलिस ने पेश किए खोखले सबूत

यह मामला साल 2017 का है, जब जूनियर इंजीनियर उज्ज्वल राज की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अभियोजन का दावा था कि माप पुस्तिका (Measurement Book) में फर्जी एंट्री करने से मना करने पर सुनील कुमार, बालमुकुंद यादव, राजू कुमार, धर्मेंद्र पासवान और नंदन यादव ने इस वारदात को अंजाम दिया था। हालांकि, हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अभियुक्तों के अधिवक्ता प्रतीक मिश्रा ने दलील दी कि पूरा मामला मनगढ़ंत 'डाइंग डिक्लेरेशन' पर टिका था, जिसे न तो मूल रूप में पेश किया गया और न ही किसी स्वतंत्र गवाह ने इसकी पुष्टि की।

पुलिस की जालसाजी का पर्दाफाश: 'फर्दबयान' नहीं, पुलिस का 'री-राइटिंग' था साक्ष्य

अदालत ने पाया कि जिसे पुलिस मुख्य साक्ष्य (डाइंग डिक्लेरेशन) बता रही थी, वह वास्तव में पुलिस अधिकारी द्वारा अपनी सुविधा के अनुसार दोबारा लिखा गया (Rewriting) दस्तावेज था। हाईकोर्ट ने साफ किया कि पुलिस के समक्ष दिए गए कबूलनामे को साक्ष्य मानना कानून के बुनियादी सिद्धांतों के विरुद्ध है। बिहार पुलिस की इस नाकामी ने न केवल एक मासूम इंजीनियर के परिवार को न्याय से वंचित किया, बल्कि असली गुनहगारों को भी कानून के शिकंजे से बचने का रास्ता दे दिया।

ट्रायल जज की योग्यता पर सवाल: 'क्रिमिनल केस से हटाकर दें ट्रेनिंग'

हाईकोर्ट ने इस मामले में शेखपुरा ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह पलट दिया, जिसमें 2019 में सभी आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने ट्रायल जज की कार्यशैली पर इतनी सख्त नाराजगी जताई कि उन्हें भविष्य में आपराधिक मामलों की सुनवाई से अलग रखने और विशेष प्रशिक्षण देने की अनुशंसा तक कर डाली। यह टिप्पणी बिहार की न्यायपालिका और पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ा आईना है।

बिहार पुलिस की नाकामी: न्याय की बलि और अपराधियों के हौसले बुलंद

उज्ज्वल राज हत्याकांड का यह फैसला बिहार पुलिस के जांच के स्तर (Investigative Standards) पर बड़ा तमाचा है। साक्ष्यों को सही ढंग से संकलित करने में विफलता और कागजी हेरफेर की आदत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि सिस्टम की कमियों के कारण रसूखदारों और अपराधियों का रास्ता साफ हो जाता है। अब सवाल यह है कि अगर ये पांचों निर्दोष थे, तो उज्ज्वल राज का असली कातिल कौन है? क्या पुलिस कभी उन असली चेहरों तक पहुँच पाएगी?