गायब फाइलों पर हाईकोर्ट ने अधिकारियों को फटकार लगाते हुए दिया निर्देश , कहा- रिकॉर्ड का न मिलना आरटीआई से इनकार का नहीं हो सकता बहाना
Patna High Court: बिहार के प्रशासनिक महकमे और लापरवाह अधिकारियों को पटना हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त और आईना दिखाने वाला फैसला सुनाया है।...
Patna High Court: बिहार के प्रशासनिक महकमे और लापरवाह अधिकारियों को पटना हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त और आईना दिखाने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी रिकॉर्ड का फटा होना, अपठनीय होना या कार्यालय से गायब हो जाना, सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी देने से इनकार करने का कोई आधार नहीं हो सकता। कोर्ट ने दो टूक शब्दों में कहा है कि राज्य सरकार या उसके विभाग अपनी ही लापरवाही और रिकॉर्ड सुरक्षित रखने में हुई विफलता का लाभ नहीं उठा सकते।
यह अहम फैसला जस्टिस राज कुमार की एकलपीठ ने सीवान जिले के मोहम्मद रिजवान द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। याचिकाकर्ता ने सीवान सदर अंचल से बरवड़ा रजिस्टर और रजिस्टर-2 की प्रमाणित प्रति मांगी थी, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने मूल रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होने और दस्तावेजों के अपठनीय होने का हवाला देकर सूचना देने से साफ इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।सार्वजनिक दस्तावेज: कोर्ट ने बरवड़ा रजिस्टर को एक सार्वजनिक दस्तावेज करार दिया, जिसमें सह-हिस्सेदारों और उनके द्वारा दिए गए लगान का विवरण होता है। यह भूमि विवाद और बंटवारे के मुकदमों में एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है।
अदालत ने अधिकारियों के इस रुख को विरोधाभासी और हास्यास्पद माना, जिसमें एक तरफ रिकॉर्ड नहीं मिलने की बात कही गई और दूसरी तरफ उसी की फटी-पुरानी फोटोकॉपी होने की दलील दी गई। कोर्ट ने इसे आरटीआई कानून की मूल भावना के विपरीत बताया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया कि यदि मूल रिकॉर्ड गायब है, तो संबंधित कार्यालय को राजस्व अभिलेखों में उपलब्ध प्रविष्टियों के आधार पर उसका पुनर्निर्माण करना होगा।
समय-सीमा तय: सीवान जिला प्रशासन को आदेश दिया गया है कि वह 4 सप्ताह के भीतर अंचलाधिकारी कार्यालय, भूमि सुधार उपसमाहर्ता कार्यालय और जिला अभिलेखागार में रिकॉर्ड की भौतिक तलाश करे। यदि दस्तावेज नहीं मिलते हैं, तो उन्हें डिजिटल रूप से सुरक्षित करने या विशेषज्ञों की मदद से तैयार कर 8 सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ता को प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराई जाए।
अदालत ने इस मामले में 6 जनवरी 2012 को राज्य सूचना आयोग द्वारा पारित आदेश और 28 जून 2011 को लोक सूचना अधिकारी (सदर अंचल, सीवान) द्वारा दिए गए इनकार के आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया है।हाईकोर्ट ने अपने फैसले में याद दिलाया कि सार्वजनिक प्राधिकरणों का यह प्राथमिक और वैधानिक दायित्व है कि वे अपने रिकॉर्ड सुरक्षित रखें ताकि नागरिकों को समय पर सूचना मिल सके। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि आरटीआई की दूसरी अपील का निस्तारण 30 से अधिकतम 45 दिनों के भीतर किया जाना चाहिए, और धारा 8 के अपवाद में न आने वाले दस्तावेजों के निरीक्षण से बिना ठोस कारण के इनकार नहीं किया जा सकता।