क्या 30 मार्च तक ही नीतीश राज या खरमास के बाद होगा बिहार में होगा नया राजतिलक या अटकी है विदाई, पढ़िए इनसाइड स्टोरी
सूबे के कद्दावर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा के मुसाफिर तो बन चुके हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की मसनद को अब भी मजबूती से थामे हुए हैं। इस दोहरे किरदार ने सूबे के सियासी गलियारों में बेचैनी और चर्चाओं का बाजार गर्म कर रखा है।...
Nitish Kumar: बिहार की फिजाओं में इन दिनों एक ही सवाल गूंज रहा है हुजूर, कुर्सी कब खाली होगी? सूबे के कद्दावर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राज्यसभा के मुसाफिर तो बन चुके हैं, लेकिन मुख्यमंत्री की मसनद को अब भी मजबूती से थामे हुए हैं। इस दोहरे किरदार ने सूबे के सियासी गलियारों में बेचैनी और चर्चाओं का बाजार गर्म कर रखा है।
सियासत की शतरंज पर नीतीश कुमार ने जो चाल चली है, वह जितनी पेचीदा है उतनी ही दिलचस्प भी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 101(2) और प्रोहिबिशन ऑफ सिमुल्टेनियस मेंबरशिप रूल्स 1950 के मुताबिक, कोई भी शख्स एक साथ दो सदनों का नुमाइंदा नहीं रह सकता। राज्यसभा चुने जाने के बाद उन्हें 14 दिनों के भीतर विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा देना होगा।
हैरत की बात यह है कि 16 मार्च को जीत का परचम लहराने के बाद भी नीतीश बाबू खामोश हैं। दरअसल, सारा खेल गजट नोटिफिकेशन पर टिका है। कानूनन, यह समय सीमा चुनाव परिणाम के सरकारी गजट में प्रकाशन के बाद शुरू होती है। जब तक गजट जारी नहीं होता, नीतीश तकनीकी तौर पर 'दो नावों' की सवारी जारी रख सकते हैं।
मुख्यमंत्री की समृद्धि यात्रा आज संपन्न हो रही है, लेकिन उनके डायरी के पन्ने 4 अप्रैल तक व्यस्त हैं-27 मार्च को पटना में रामनवमी की रौनक।31 मार्च को नालंदा यूनिवर्सिटी में राष्ट्रपति की मौजूदगी में शिरकत।04 अप्रैल को मोतिहारी में उपराष्ट्रपति के साथ दीक्षांत समारोह।इन कार्यक्रमों की फेहरिस्त साफ जाहिर करती है कि नीतीश कुमार अपनी विदाई को एक गरिमापूर्ण और शाही अंदाज देना चाहते हैं।
बिहार की राजनीति में सिर्फ अंकगणित नहीं, बल्कि ग्रह-नक्षत्र भी अहम भूमिका निभाते हैं। कहा जा रहा है कि 13 अप्रैल तक खरमास का साया है, जिसमें भाजपा कोई भी नया और शुभ कार्य करने से कतराती है। मुमकिन है कि नीतीश कुमार 14 अप्रैल के बाद ही अपनी गद्दी छोड़ें, ताकि नई हुकूमत का आगाज शुभ मुहूर्त में हो सके।
नीतीश कुमार का राज्यसभा के लिए चुना जाना और फिर भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहना, बिहार की राजनीति में वेट एंड वॉच की स्थिति पैदा कर चुका है। बिहार के सियासी गलियारों में आजकल चर्चा सिर्फ दो ही बातों की है संविधान की धाराएं और सरकारी गजट। नीतीश कुमार ने 16 मार्च को राज्यसभा की जंग तो जीत ली, लेकिन तकनीकी तौर पर वह अभी भी बिहार विधान परिषद (MLC) के सदस्य और मुख्यमंत्री हैं।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 101 (2) और प्रोहिबिशन ऑफ सिमुल्टेनियस मेंबरशिप रूल्स 1950 बहुत स्पष्ट हैं कि कोई भी व्यक्ति एक साथ संसद और राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं रह सकता। नियम के मुताबिक, जीत के बाद 14 दिनों के भीतर एक पद से इस्तीफा देना अनिवार्य है।यह 14 दिन की गिनती जीत की तारीख से नहीं, बल्कि गजट नोटिफिकेशन के प्रकाशन से शुरू होती है।
चूँकि अभी तक राज्यसभा चुनाव के नतीजों का आधिकारिक गजट जारी नहीं हुआ है, इसलिए नीतीश कुमार कानूनी तौर पर सुरक्षित हैं और दोनों पदों का लुत्फ उठा रहे हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि 30 मार्च तक गजट जारी हो जाता है और उसके 14 दिन के भीतर नीतीश इस्तीफा नहीं देते, तो उनकी राज्यसभा की सदस्यता पर संकट आ सकता है। यही वजह है कि उनकी 'समृद्धि यात्रा' का समापन और 4 अप्रैल तक के उनके व्यस्त कार्यक्रम (जिसमें राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के साथ कार्यक्रम शामिल हैं) को उनकी विदाई पारी के तौर पर देखा जा रहा है।
चर्चा है कि नीतीश कुमार एक ही झटके में सब कुछ नहीं छोड़ेंगे। उनकी रणनीति दो किस्तों वाली हो सकती है। पहली किस्त में वह विधान परिषद (MLC) से इस्तीफा देकर पूरी तरह राज्यसभा सदस्य बनेंगे। दूसरी किस्त में मुख्यमंत्री पद का त्यागपत्र वह तभी देंगे जब भाजपा के साथ 'अगले उत्तराधिकारी' का नाम पूरी तरह फाइनल हो जाएगा और खरमास (13 अप्रैल) का साया हट जाएगा।
बहरहाल नीतीश कुमार यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि जब वह दिल्ली की ओर रुख करें, तो पटना में उनकी विरासत और गठबंधन की साख दोनों सलामत रहें। बहरहाल अभी गजट प्रकाशित नहीं हुआ है तो नीतीश पर अभी एमएलसी के पद से इस्तीफा देने की जरुरत नहीं है।