AK-47 की गूंज में घिरी सीवान पुलिस! एसपी के बदलते बयान, सवालों के कटघरे में पूरा सिस्टम, आखिर सच कौन छिपा रहा है? पढ़िए सीवान गोलीकांड का सबसे बड़ा रहस्य

Bihar Police: एक ओर छात्रों पर अत्याधुनिक हथियार एके 47 के इस्तेमाल को लेकर बहस जारी है, तो दूसरी ओर पुलिस अधीक्षक के अलग-अलग समय पर दिए गए आधिकारिक बयानों ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक विवादित बना दिया है।...

AK 47 Firing in Siwan Sparks Questions Over sp Police Versio
AK-47 की गूंज में घिरी सीवान पुलिस!- फोटो : social Media

Bihar Police:  बिहार के सीवान में छात्र प्रदर्शन के दौरान AK-47 से हुई फायरिंग का मामला अब सिर्फ कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि पुलिस की कार्रवाई, प्रशासनिक जवाबदेही और आधिकारिक बयानों की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। घटना ने सियासी गलियारों से लेकर अदालत तक बहस छेड़ दी है। सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि पुलिस अधीक्षक पुरन कुमार झा  के अलग-अलग समय पर दिए गए बयानों में महत्वपूर्ण अंतर दिखाई देता है।

घटना के बाद पहले एसपी पूरन कुमार झा ने आधिकारिक बयान में कहा गया कि 25 जुलाई 2026 को बिहार बंद के दौरान जेपी चौक पर हालात बेकाबू होने लगे थे। भीड़ से जान-माल को खतरा महसूस होने पर, एसपी के साथ प्रतिनियुक्त सिपाही अभिषेक कुमार ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए AK-47 से चार राउंड हवाई फायरिंग की।

लेकिन दो दिन बाद जारी दूसरे बयान में तस्वीर बदल गई। इस बार एसपी साहब ने  दावा किया  कि सिपाही अभिषेक किसी प्रदर्शन ड्यूटी पर नहीं, बल्कि DIU टीम के साथ एक अलग मामले की जांच के लिए जा रहे थे। प्रदर्शनकारियों के बीच टीम के फंस जाने के कारण सुरक्षा के मद्देनज़र फायरिंग की गई।

यहीं से पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया। सवाल उठने लगे कि आखिर सच क्या है? क्या अभिषेक कुमार प्रदर्शन ड्यूटी पर तैनात थे या जांच टीम के सदस्य थे? अगर दोनों में से कोई एक बात सही है, तो दूसरा बयान क्यों दिया गया? पुलिस की आधिकारिक कहानी में यही विरोधाभास अब सबसे बड़ा विवाद बन गया है।

इतना ही नहीं, फायरिंग की वजह भी दोनों बयानों में अलग-अलग बताई गई। पहले बयान में कहा गया कि उग्र भीड़ को तितर-बितर करने के लिए गोलियां चलाई गईं, जबकि दूसरे बयान में दावा किया गया कि पुलिस टीम की सुरक्षा के लिए यह कदम उठाना पड़ा। दोनों दावों के बीच का फर्क पूरे घटनाक्रम को संदेह के घेरे में ला देता है।

पुलिस सूत्रों के अनुसार, बिहार बंद को देखते हुए सुबह ही जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क था। एसपी और डीएम की बैठक में संवेदनशील इलाकों में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की थी। इसके बावजूद जब हजारों छात्र गांधी मैदान पहुंचे तो मौके पर पुलिस बल बेहद सीमित बताया गया। बाद में भीड़ शहर के अलग-अलग हिस्सों में फैल गई और दोपहर में जेपी चौक पर तनाव बढ़ गया।

घटना से जुड़े कई वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आए हैं। इन वीडियो में एक पुलिसकर्मी को AK-47 लेकर आगे बढ़ते हुए फायरिंग करते देखा जा सकता है।कुछ सुरक्षा मामलों के जानकारों ने सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वीडियो का हवाला देते हुए सवाल उठाए हैं कि यदि संबंधित सिपाही वास्तव में किसी अन्य जांच पर जा रहे थे, तो वे दंगा-रोधी उपकरणों के साथ पुलिस लाइन में क्यों दिखाई दे रहे थे। वहीं यह भी चर्चा है कि वीडियो में वॉटर कैनन, पर्याप्त सार्वजनिक चेतावनी या अन्य भीड़ नियंत्रण उपाय स्पष्ट रूप से नजर नहीं आते। हालांकि इन दावों की  जांच हो रही है।

जिलाधिकारी ने सार्वजनिक बयान में कहा कि AK-47 से फायरिंग नहीं होनी चाहिए थी और इसके लिए उनकी ओर से कोई आदेश जारी नहीं किया गया था। दूसरी ओर पुलिस का पक्ष अलग कहानी पेश करता है। ऐसे में प्रशासन के भीतर भी तथ्यों को लेकर असंगति दिखाई देने का आरोप लगाया जा रहा है।

अब यह मामला स्थानीय दायरे से निकलकर  लोकसभा से लेकर देश की सबसे बड़ी आदालत तक पहुंच गई है। विपक्ष लगातार निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है और पूरे घटनाक्रम को लेकर कई संवैधानिक व कानूनी सवाल उठाए जा रहे हैं। जब एसपी साहब के बयान में ही विरोधाभाष है तो ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर 25 जुलाई को सीवान में वास्तव में क्या हुआ, किस परिस्थिति में AK-47 से फायरिंग हुई, और एसपी के आधिकारिक बयानों में इतना अंतर क्यों है? इन सवालों का जवाब अब निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया से ही सामने आ सकेगा।