प्रोफेसर सियारमण त्रिपाठी: हिंदी साहित्य के नक्षत्र का महाप्रयाण, विद्वज्जनों एवं प्रबुद्ध वर्ग द्वारा दी गई अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

डी ए वी महाविद्यालय के हिन्दी के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात लेखक प्रोफेसर सियारमण त्रिपाठी का 97साल की इहलौकिक यात्रा के बाद देवलोकगमन साहित्य संसार के लिए एक अपूरणीय क्षति है

Tripathi siyaraman

Bihar News:हिंदी साहित्य, शिक्षा जगत एवं समाज सेवा के क्षेत्र में अपने अमूल्य अवदानों से अमिट पदचिह्न छोड़ने वाले मूर्धन्य विद्वान, डी ए वी महाविद्यालय के हिन्दी के पूर्व विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात लेखक प्रोफेसर सियारमण त्रिपाठी का 97साल की इहलौकिक यात्रा के बाद देवलोकगमन साहित्य संसार के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनका संपूर्ण जीवन साहित्य साधना, ज्ञान के प्रसार तथा समाज कल्याण के प्रति समर्पित रहा। उनके भौतिक देह के पंचतत्व में विलीन होने के समाचार से समग्र प्रोफेसर सियारमण त्रिपाठी हिंदी भाषा एवं साहित्य के अनन्य आराधक थे। अपनी विलक्षण लेखनी एवं सूक्ष्म जीवन-दृष्टि से उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ-रत्नों की रचना की, जिन्होंने पाठकों के हृदय पर अमिट छाप छोड़ी है। उनकी कालजयी कृतियों में 'दिवंगता माता के नाम अंतिम पाती' भावुकता, संवेदना एवं भावात्मक तरंगों का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो पाठक को अंतरमन तक उद्वेलित कर देती है।

तदोपरांत, उनकी काव्य-चेतना एवं प्रकृति-प्रेम की परिचायक रचना 'सरसों सलोनी और गेहूं की बाली' ग्रामीण परिवेश, सौंदर्यबोध एवं मानवीय संवेदनाओं का अनुपम सम्मिश्रण प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त, उनका प्रसिद्ध स्मृति ग्रंथ 'सृष्टि एवं दृष्टि' उनके जीवन दर्शन, वैचारिक प्रौढ़ता एवं दार्शनिक चिंतन का जीवंत प्रमाण है। हिंदी साहित्य जगत में उनकी रचनाओं को अत्यंत उच्च की है 

प्रोफेसर त्रिपाठी केवल एक सिद्धहस्त रचनाकार ही नहीं, अपितु एक ओजस्वी शिक्षाविद एवं समाज-संरक्षक भी थे। उन्होंने सीवान स्थित प्रतिष्ठित डीएवी पीजी कॉलेज के हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। अपने दीर्घकालिक अध्यापन काल में उन्होंने सहस्रों विद्यार्थियों को ज्ञानार्जन हेतु प्रेरित किया और उनके चरित्र निर्माण में महती भूमिका निभाई। उनके द्वारा सिंचित ज्ञान की धारा आज भी उनके शिष्यों के माध्यम से प्रवाहित हो रही है।

शैक्षणिक दायित्वों से सेवानिवृत्ति के उपरांत भी उनकी कर्मठता में कोई कमी नहीं आई। उन्होंने सीवान जिला पेंशनर समाज के अध्यक्ष के रूप में दीर्घकाल तक निस्वार्थ भाव से अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों एवं सेवानिवृत्त कर्मचारियों के कल्याणार्थ अनेक सराहनीय कार्य किए। उनका परिवार भी उनके ज्ञान-यज्ञ की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। उनके दो योग्य पुत्र, प्रोफेसर शिशिर कुमार 'कौशिक' एवं प्रोफेसर कुमार अमलेंदु त्रिपाठी, तथा उनकी तीन पुत्रियाँ शिक्षा एवं अध्यापन के पवित्र कार्य से सम्बद्ध होकर समाज को आलोकित कर रहे हैं।

प्रोफेसर त्रिपाठी का अंतिम संस्कार आज यानी 27 जुलाई को सीवान स्थित पवित्र दाहा नदी के तट पर अवस्थित कंधवारा श्मशान घाट पर संपूर्ण वैदिक रीति-रिवाज एवं समादर के साथ संपन्न हुआ।

उनके तिरोभाव का समाचार प्राप्त होते ही साहित्यकारों, प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं उनके असंख्य प्रशंसकों में शोक की लहर व्याप्त हो गई। विविध साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं ने उनके निधन पर गहरा शोक संताप व्यक्त करते हुए उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित की है। मूर्धन्य साहित्यकार प्रोफेसर सियारमण त्रिपाठी के देवलोकगमन पर शैक्षणिक एवं साहित्यिक जगत में शोक की लहर व्याप्त है। सीवान के अनेक गणमान्य विद्वानों एवं शिक्षाविदों ने उनके निधन को हिंदी साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति बतलाया है।

डॉ. रामानन्द पाण्डेय, डॉ. रामचंद्र सिंह, प्रोफेसर रबीन्द्र पाठक, प्रोफेसर चंद्रिका सिंह, प्रोफेसर ओबेदुल्लाह, प्रोफेसर सी.डी. चौधरी, डॉ. यतींद्र नाथ सिन्हा, डॉ सुरेंद्र नाथ पांडेय एवं डॉ. राजेन्द्र सिंह ने उनके तिरोभाव पर गहरा शोक संताप व्यक्त किया। समस्त प्रबुद्ध जनों ने दिवंगत आत्मा की सद्गति हेतु ईश्वर से प्रार्थना करते हुए शोक संतप्त परिजनों के प्रति अपनी गहन संवेदनाएँ एवं श्रद्धांजलि अर्पित कीं।

प्रोफेसर सियारमण त्रिपाठी अपने उत्कृष्ट विचारों, सात्विक जीवन शैली और ओजस्वी कृतियों के माध्यम से अमर रहेंगे।