चाय के ठेले से क्रिकेट के मैदान तक: सुपौल की अंशु का संघर्ष

बिहार की बेटी के अदम्य साहस और जीवंत इच्छाशक्ति की एक प्रेरणादायक कहानी है। सुपौल की अंशु कुमारी चाय का ठेला लगाकर अपने क्रिकेट सपने को न केवल जिंदा रखे हुए हैं बल्कि नोएडा में 22 गरीब बच्चों को फ्री क्रिकेट ट्रेनिंग दे रही हैं.

चाय के ठेले से क्रिकेट के मैदान तक: सुपौल की अंशु का संघर्ष
चाय के ठेले से क्रिकेट के मैदान तक: सुपौल की अंशु का संघर्ष- फोटो : News 4 Nation

बिहार के सुपौल जिले की रहने वाली अंशु कुमारी की कहानी इन दिनों सोशल मीडिया और खेल जगत में चर्चा का विषय बनी हुई है। एक साधारण परिवार से आने वाली अंशु का सफर गांव की तंग गलियों से शुरू होकर नोएडा के क्रिकेट मैदानों तक पहुँच गया है। अंशु की दिनचर्या बेहद कठिन है; वह अपने सपनों को सच करने और घर चलाने के लिए सुबह-सुबह चाय का ठेला लगाती हैं, और फिर दोपहर की चिलचिलाती धूप में घंटों क्रिकेट की प्रैक्टिस करती हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बनकर देश और अपने माता-पिता का नाम रोशन करना है।


पिता के साये के बाद कोच के धोखे ने भी नहीं तोड़ी हिम्मत

अंशु के जीवन में संघर्ष तब शुरू हुआ जब उनके पिता, जो रिक्शा चलाकर परिवार पालते थे, बीमारी के कारण चल बसे। पिता के निधन से उनकी पढ़ाई और खेल दोनों पर विराम लग गया। इसी बीच एक कोच ने उन्हें नोएडा में मुफ्त ट्रेनिंग का झांसा दिया, जिसके भरोसे वह अपनी माँ के साथ बिहार छोड़कर नोएडा आ गईं। लेकिन वहाँ पहुँचते ही कोच अपने वादे से मुकर गया। इस धोखे ने अंशु को तोड़ने के बजाय और मजबूत बना दिया। उन्होंने हार मानने के बजाय ₹20,000 जुटाकर चाय की दुकान खोली ताकि वे अपनी ट्रेनिंग का खर्च खुद उठा सकें।

खुद के सपनों के साथ 22 गरीब बच्चों को दे रहीं मुफ्त ट्रेनिंग

अंशु केवल अपने लिए ही नहीं लड़ रही हैं, बल्कि वे समाज के उन बच्चों के लिए भी उम्मीद की किरण बन गई हैं जो पैसों की कमी के कारण खेल नहीं पाते। वर्तमान में अंशु नोएडा में एक क्रिकेट एकेडमी चला रही हैं, जहाँ वे 22 ऐसे बच्चों को मुफ्त क्रिकेट ट्रेनिंग दे रही हैं जो फीस देने में असमर्थ हैं। इस एकेडमी का पूरा खर्च—मैदान का किराया, खेल उपकरण और कोच की सैलरी—अंशु अपने चाय के ठेले से होने वाली कमाई से अकेले उठा रही हैं। उनका यह जज्बा दूसरों के सपनों को पंख देने का काम कर रहा है।

110 किमी/घंटा की रफ्तार और भाई की वह सलाह

अंशु के क्रिकेटर बनने की शुरुआत उनके घर के आंगन से हुई थी। एक दिन अपने भाई के साथ खेलते वक्त उन्होंने इतनी तेज गेंद फेंकी कि उनके भाई भी दंग रह गए। भाई की हौसलाअफजाई के बाद उन्होंने प्रोफेशनल क्रिकेट को अपनाया और आज वे 110 किमी/घंटा की रफ्तार से गेंदबाजी करती हैं। अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर अंशु ने यह साबित कर दिया है कि अगर इरादे बुलंद हों, तो तंगहाली और मुश्किलें भी रास्ता नहीं रोक सकतीं। वे आज न केवल एक खिलाड़ी हैं, बल्कि महिला सशक्तिकरण की एक जीती-जागती मिसाल बन चुकी हैं।