बिहार- यूपी में पशु सखियों के लिए वरदान बनी 'हाइड्रोपोनिक्स' तकनीक,7 दिनों में चारा उगा हो रही कमाई
भीषण गर्मी के मौसम में अक्सर पशुपालकों के सामने हरे चारे का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों से एक बेहद राहत देने वाली और प्रेरणादायक खबर सामने आई है।
पटना : भीषण गर्मी के मौसम में अक्सर पशुपालकों के सामने हरे चारे का गंभीर संकट खड़ा हो जाता है। ऐसे में उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों से एक बेहद राहत देने वाली और प्रेरणादायक खबर सामने आई है। इन राज्यों के छोटे बकरी पालकों और ग्रामीण महिला उद्यमियों के लिए कम लागत वाली 'हाइड्रोपोनिक्स तकनीक' (बिना मिट्टी के पानी में पौधा उगाने की विधि) एक बड़ा सहारा बनकर उभरी है। द गोट ट्रस्ट द्वारा एसबीआई (SBI) फाउंडेशन के ग्राम सेवा कार्यक्रम के सहयोग से चलाई जा रही एक पायलट परियोजना के तहत, ग्रामीण महिलाएं अब अपने घरों में ही मैनुअल हाइड्रोपोनिक इकाइयों के जरिए मात्र सात दिनों में पौष्टिक और ताजा हरा चारा तैयार कर रही हैं। इस अनोखी पहल से जहां एक तरफ चारे की किल्लत दूर हो रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार के नए रास्ते खुल गए हैं।
क्या है खासियत?
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें हरा चारा उगाने के लिए न तो उपजाऊ खेत की जरूरत होती है, न मिट्टी की और न ही बिजली की। पारंपरिक खेती के मुकाबले इसमें 90 प्रतिशत कम पानी खर्च होता है। महज 6 फीट लंबी और 4 फीट चौड़ी एक छोटी सी मैनुअल यूनिट को लगाने में लगभग 8,000 से 12,000 रुपये तक का खर्च आता है। इस छोटी सी जगह से महिलाएं रोजाना 20 से 25 किलो तक मक्का, गेहूं या जौ का शानदार हरा चारा तैयार कर लेती हैं। इस चारे को वे आसपास के पशुपालकों को करीब 5 रुपये प्रति किलो की किफायती दर पर बेच रही हैं, जिससे उन्हें हर महीने 3,000 से 3,500 रुपये तक की शुद्ध बचत हो रही है। वर्तमान में इस पहल से 150 से अधिक छोटे पशुपालक किसान सीधे लाभान्वित हो रहे हैं।
खनिज की भरपुर मात्रा
विशेषज्ञों और 'गोट मैन' के नाम से मशहूर संजीव कुमार के अनुसार, हाइड्रोपोनिक विधि से तैयार यह हरा चारा बकरियों के स्वास्थ्य के लिए किसी अमृत से कम नहीं है। इस चारे में प्रचुर मात्रा में विटामिन, एंजाइम और जरूरी खनिज पाए जाते हैं। चूंकि इस चारे में 80 से 85 प्रतिशत तक सिर्फ नमी (पानी की मात्रा) होती है, इसलिए यह कड़कती गर्मी में बकरियों के शारीरिक तनाव को कम करता है और उनके पाचन तंत्र यानी रूमेन को सक्रिय बनाए रखता है। फील्ड मॉनिटरिंग के दौरान इसके बेहद चौंकाने वाले और सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। इस पौष्टिक चारे को खाने से बकरियों की गर्भधारण दर में 25 से 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। साथ ही, गाभिन (गर्भवती) बकरियों की सेहत में सुधार हुआ है और समय से पहले होने वाले गर्भपात के मामलों में भारी कमी आई है।
गया जिले में प्रयोग
बिहार के गया जिले की रहने वाली सुनीता देवी जैसी तमाम महिला उद्यमियों के जीवन में इस तकनीक ने बड़ा बदलाव लाया है। सुनीता बताती हैं कि पहले मई-जून की जानलेवा गर्मी में उन्हें बकरियों के लिए हरी पत्तियां और चारा ढूंढने कई किलोमीटर दूर पैदल भटकना पड़ता था। लेकिन अब वे अपने घर के बरामदे में ही आसानी से रोजाना 25 किलो हरा चारा उगा रही हैं और उसे बेचकर सम्मानजनक कमाई भी कर रही हैं। एक किलो बीज से करीब 6 से 8 किलो तक चारा आसानी से तैयार हो जाता है, जिसमें सिर्फ प्लास्टिक ट्रे, शेड नेट और थोड़े से पानी की आवश्यकता होती है। 45 महिला उद्यमियों के साथ इस सफल प्रयोग के बाद, द गोट ट्रस्ट अब अगले साल तक तीनों राज्यों में ऐसी 500 नई हाइड्रोपोनिक इकाइयां स्थापित करने की तैयारी कर रहा है, ताकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को और मजबूत किया जा सके।