1742 में बना जंतर-मंतर कैसे बना देश का सबसे बड़ा प्रदर्शन स्थल, यहाँ हुए भारत में इतिहास बदलने वाले कई प्रोटेस्ट
दिल्ली के जंतर-मंतर का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18वीं सदी में कराया था। इसका निर्माण 1724 के आसपास शुरू हुआ और यह 1742 तक खगोलीय वेधशाला के रूप में विकसित हो चुका था। फिर देश का सबसे बड़ा प्रदर्शन स्थल बन गया
Jantar Mantar: देश की राजनीति, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों, महिला सुरक्षा की मांग और किसानों के संघर्ष का गवाह रहा दिल्ली का जंतर-मंतर अब विरोध-प्रदर्शनों के लिए उपलब्ध नहीं होगा। दिल्ली पुलिस ने 11 अक्टूबर 2026 को जंतर-मंतर रोड को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया। इसके साथ ही उस जगह का एक ऐतिहासिक अध्याय भी खत्म होता नजर आ रहा है, जहां दशकों से आम नागरिकों से लेकर किसान, छात्र, खिलाड़ी और सामाजिक कार्यकर्ता अपनी आवाज बुलंद करते रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जिस जंतर-मंतर को आज देश के प्रमुख प्रदर्शन केंद्रों में गिना जाता है, उसका निर्माण विरोध-प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि खगोलीय गणनाओं के लिए किया गया था। करीब तीन शताब्दी पहले बना यह परिसर समय के साथ सत्ता तक अपनी बात पहुंचाने का एक अहम प्रतीक बन गया।
1742 में खगोलीय गणना के लिए हुआ था निर्माण
दिल्ली के जंतर-मंतर का निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 18वीं सदी में कराया था। इसका निर्माण 1724 के आसपास शुरू हुआ और यह 1742 तक खगोलीय वेधशाला के रूप में विकसित हो चुका था। इसका मूल उद्देश्य सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति का अध्ययन करना तथा खगोलीय तालिकाएं तैयार करना था। लेकिन इतिहास ने इस वैज्ञानिक परिसर को एक नई पहचान दी। संसद और केंद्र सरकार के प्रमुख कार्यालयों के नजदीक स्थित होने के कारण यह धीरे-धीरे विरोध-प्रदर्शनों के लिए अहम जगह बन गया।
बोट क्लब से जंतर-मंतर तक पहुंचा विरोध का केंद्र
1990 के दशक से पहले दिल्ली में बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र इंडिया गेट और विजय चौक के आसपास का बोट क्लब क्षेत्र हुआ करता था। अक्टूबर 1988 में किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में हजारों किसानों ने बोट क्लब क्षेत्र में विशाल रैली की थी। किसानों के साथ मवेशियों की मौजूदगी ने इस आंदोलन को खास पहचान दी। बाद में बोट क्लब में प्रदर्शनों पर लगी पाबंदियों के बीच जंतर-मंतर एक वैकल्पिक स्थल के रूप में उभरा। संसद से तीन किलोमीटर से भी कम दूरी पर स्थित होने के कारण यहां होने वाले प्रदर्शनों का राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व बढ़ता गया।
अन्ना आंदोलन से पहलवानों के धरने
जंतर-मंतर ने पिछले तीन दशकों में कई बड़े आंदोलनों को अपने बीच जगह दी। वर्ष 1993 में आर्थिक नीतियों और सांप्रदायिकता के विरोध में कई संगठनों ने यहां जेल भरो आंदोलन किया। अप्रैल 2011 में अन्ना हजारे के पांच दिवसीय अनशन ने भ्रष्टाचार के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन को गति दी। जन लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। दिसंबर 2012 में दिल्ली में निर्भया सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद महिला सुरक्षा और न्याय की मांग को लेकर देशभर में आक्रोश देखने को मिला। इस दौरान जंतर-मंतर सहित दिल्ली के कई स्थान विरोध के केंद्र बने।
वर्ष 2014 में पूर्वोत्तर के छात्र नीडो तानिया की मौत के बाद नस्लीय भेदभाव के खिलाफ प्रदर्शन हुए। 2017 में तमिलनाडु के किसानों ने कर्ज, सूखा और कृषि संकट को लेकर लंबे समय तक धरना दिया। दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में भी यहां बड़ी संख्या में लोग जुटे। 2023 में भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर यौन उत्पीड़न के आरोपों को लेकर प्रमुख पहलवानों ने यहां प्रदर्शन किया। 2024 में NEET-UG परीक्षा में कथित अनियमितताओं के खिलाफ छात्रों ने आवाज उठाई। 2026 में परीक्षा से जुड़ा विवाद भी विरोध-प्रदर्शनों की वजह बना।
प्रतिबंधों और अदालतों के बीच जारी रही बहस
अक्टूबर 2017 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने जंतर-मंतर से प्रदर्शनों को रामलीला मैदान स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था। जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शनों पर लगाए गए व्यापक प्रतिबंध को हटाते हुए कहा कि विरोध के अधिकार और स्थानीय निवासियों के शांतिपूर्ण जीवन के अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है।
अब केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति की सिफारिशों के बाद जंतर-मंतर रोड को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाया गया है। इसके विकल्प के रूप में मध्य दिल्ली में रामलीला मैदान, उत्तर दिल्ली में बुराड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली में सीबीडी मैदान का नाम शामिल किया गया है। जंतर-मंतर का इतिहास बताता है कि एक खगोलीय वेधशाला कैसे जनआंदोलनों की पहचान बनी। अब इसके प्रदर्शन स्थल की सूची से बाहर होने के बाद सवाल यह है कि क्या नए निर्धारित स्थल भी जनता की आवाज को उतनी ही प्रमुखता से सत्ता तक पहुंचा पाएंगे?