भस्म से विभूति तक महादेव का महात्म्य, तांडव में छिपा है सृष्टि का ये परम रहस्य, सावन में जलाभिषेक का क्या है रहस्य, पढ़िए

Shiv Sawan puja: शिव की आराधना बाह्य आडंबर से अधिक आंतरिक समर्पण की साधना है। उनके समक्ष ज्ञान का अहंकार भी व्यर्थ है और अज्ञान का भय भी। भक्त केवल अपना मस्तक झुका दे...

Sawan Jalabhishek
महादेव के विराट स्वरूप की आराधना- फोटो : Hiresh Kumar

Shiv Sawan puja: शिव सर्वव्यापक हैं, ब्रह्म और वेदों के साक्षात् स्वरूप हैं। वे विकल्परहित, इच्छारहित और आकाश के समान अनन्त हैं। उनका कोई बंधन नहीं, कोई सीमा नहीं। वे कल्याणकारी भी हैं और संहारकारी भी। वे सदैव अभय प्रदान करते हैं, धर्म की प्रतिष्ठा करते हैं और अधर्म का विनाश करते हैं। वे चित्त के परम आनन्द हैं, चेतना के स्पंदन हैं और साधक के अन्तःकरण में जाग्रत होने वाली उस दिव्य अनुभूति का नाम हैं, जहाँ अहंकार का विलय हो जाता है। ऐसे कामदेवनाशी, नीलकण्ठ, महाकाल, आशुतोष भगवान शिव को बारंबार प्रणाम।

सावन की तीसरी सोमवारी पर आज शिवालयों में श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ है। कहीं कांवड़िए पवित्र जल लेकर महादेव के अभिषेक के लिए उपस्थित हैं, तो कहीं भक्त पार्थिव शिव की रचना कर उनकी आराधना में लीन हैं। मिट्टी को सानकर शिवलिंग का निर्माण करना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में जीवन और प्रकृति के अद्भुत सामंजस्य का प्रतीक है। पार्थिव शिव के साथ गौरी और गणेश की रचना तथा चारों ओर ग्यारह रुद्रों की स्थापना करके रुद्राभिषेक के मंत्रों से जलार्पण किया जाता है। पार्थिव शिव की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि उन्हें किसी वैभव की आवश्यकता नहीं। न स्वर्ण का सिंहासन, न रत्नजटित आभूषण, न कोई जटिल विधान केवल श्रद्धा, निर्मल चित्त और समर्पित भाव। मिट्टी से बने शिव की पूजा के पश्चात् उनका विसर्जन प्रकृति में ही कर दिया जाता है। यह परंपरा मनुष्य को स्मरण कराती है कि समस्त भौतिक वैभव क्षणभंगुर है और अंततः पंचमहाभूतों में ही विलीन होना है। यही कारण है कि शिव भारतीय अध्यात्म की सर्वोच्च शिखर हैं। 

विष्णु की प्रतिमा के लिए स्वर्ण, ताम्र या शिला का विधान हो सकता है, किंतु शिव मिट्टी के एक साधारण पिंड में भी प्रतिष्ठित हो जाते हैं। शिव उस जनमानस के देवता हैं, जिसके पास भव्यता नहीं, किंतु भावनाओं की संपदा है। वे राजमहलों से अधिक श्मशान में सहज हैं और अलंकारों से अधिक भस्म में रमण करते हैं। शिव की यही निरपेक्षता उन्हें अद्वितीय बनाती है। वे भूति और विभूति के देवता हैं, जिन्हें सांसारिक वैभव का कोई मोह नहीं। इसी विरक्त महेश्वर को पाने के लिए अन्नपूर्णा ने कठोर तपस्या की। फिर श्मशान और विवाह-मंडप का अद्भुत समन्वय हुआ। गजचर्म और हंसदुकूल का गठबंधन हुआ। भोलेनाथ ने अपने अस्तित्व का आधा भाग शक्ति को देकर अर्धनारीश्वर का विराट स्वरूप धारण किया। यह केवल पौराणिक आख्यान नहीं, बल्कि पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति तथा चेतना और सृजन के सनातन समन्वय का प्रतीक है।

महादेव का तांडव इसी गतिशील सृष्टि के परम मंगल का उद्घोष है। उनके डमरू की ध्वनि में सृजन है, उनके तांडव में परिवर्तन है और उनके संहार में नवसृजन का बीज छिपा है। शिव का तांडव भय और सौंदर्य, विनाश और सृजन, मृत्यु और जीवन के अद्भुत सामंजस्य को प्रकट करता है। शशिशेखर का यह दिव्य तांडव मनुष्य को उस अंधकार में भी आगे बढ़ने का साहस देता है, जहाँ सामान्य दृष्टि प्रकाश की कल्पना तक नहीं कर पाती।

समुद्र-मंथन की पौराणिक कथा में जब हलाहल विष प्रकट हुआ और उससे समस्त सृष्टि के विनाश का संकट उत्पन्न हुआ, तब भगवान शिव ने लोककल्याण के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। इसी कारण वे नीलकण्ठ कहलाए। मान्यता है कि विष की उष्णता को शांत करने के लिए देवताओं, ऋषियों और भक्तों ने शिव पर जल अर्पित किया। तभी से सावन मास में जलाभिषेक और बेलपत्र अर्पित करने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई।

शिव की आराधना अंततः बाह्य आडंबर से अधिक आंतरिक समर्पण की साधना है। उनके समक्ष ज्ञान का अहंकार भी व्यर्थ है और अज्ञान का भय भी। भक्त केवल अपना मस्तक झुका दे, वही पर्याप्त है। “मैं कुछ नहीं जानता-न योग, न जप, न पूजा। हे देव! आपके समक्ष अपना मस्तक सदैव झुकाता हूँ। ऐसे करुणामय, कल्याणस्वरूप, नीलकण्ठ महादेव को बारंबार नमस्कार है नमस्कार है।”