Vijayadashami: शीश की बलि चढ़ानेवाला रावण अपना वंश तक नहीं बचा सका, जीव हत्या से कैसे बचेगी आत्मा? विजयदशमी पर पढ़िए कैसे होता है कर्म का हिसाब
Vijayadashami: आस्था रखिए पर विवेक के साथ, पूजा कीजिए पर करुणा के साथ।
Vijayadashami: इतिहास के पन्नों से लेकर पौराणिक कथाओं तक, अहंकार और अधर्म का परिणाम हमेशा विनाशकारी रहा है। रावण का प्रसंग केवल एक पात्र की कहानी नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति के लिए वह चेतावनी है जो यह सिखाती है कि बड़े से बड़ा तप और ऐश्वर्य भी अधर्म के परिणामों को टाल नहीं सकता।
रावण का पतन: तप और अहंकार का अंत
लंकापति रावण साधारण मानव नहीं था। वह वेदों का ज्ञाता, महाप्रतापी शिवभक्त और सोने की लंका का स्वामी था। अपनी प्रचंड साधना और भक्ति के बल पर उसने असंभव प्रतीत होने वाली सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उसने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए अपनी शारीरिक आहुति यानी शीश तक चढ़ा दिया था। परंतु क्या वह महाबलि अपने इस कृत्य और अपने अहंकार के बल पर अपनी सोने की लंका को बचा सका? क्या वह अपने संपूर्ण वंश को सर्वनाश से बचा पाया?
यह प्रश्न आज भी इतिहास के पन्नों से गूँजता हुआ हर उस व्यक्ति से सवाल करता है जो यह मानता है कि बाह्य अनुष्ठानों या किसी जीव की बलि से वह अपने हर पाप और अधर्म को ढँक सकता है। रावण का विनाश इस अकाट्य सत्य का प्रमाण है कि कर्म के विधान से कोई भी नहीं बच सकता चाहे वह कितना भी ज्ञानी या शक्तिशाली क्यों न हो।
आस्था का सच्चा स्वरूप
आज के समय में जब देवी की आराधना या धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर पशुबलि की प्रथा पर विचार किया जाता है, तो यह सवाल बेहद प्रासंगिक हो जाता है कि क्या करुणा के बिना कोई भी भक्ति पूर्ण हो सकती है? भावनाओं का सम्मान और आत्ममंथन जरुरी है। किसी भी श्रद्धालु की आस्था का उपहास उड़ाना उचित नहीं है, किंतु अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति के मार्ग पर विचार करना मनुष्य का नैतिक कर्तव्य है। जिस जीव में जीवन है, उसे भी पीड़ा का अहसास होता है। सनातन संस्कृति में अहिंसा और करुणा को सर्वोच्च धर्म माना गया है। ऐसे में क्या बिना किसी निर्दोष जीव की बलि दिए देवी की उपासना नहीं की जा सकती? ईश्वर केवल बाहरी दिखावे या कर्मकांड से प्रसन्न नहीं होते। सच्ची पूजा वही है जो मनुष्य के भीतर छिपी क्रूरता, निर्दयता और अहंकार को समाप्त कर उसे संवेदनशील बनाए।
प्रकृति का नियम बिल्कुल स्पष्ट है जैसा बीज बोओगे, वैसा ही फल काटोगे। यह भ्रम पाल लेना कि कोई विशेष अनुष्ठान कर लेने से हमारे गलत आचरण के परिणाम बदल जाएंगे, स्वयं को धोखे में रखने जैसा है। रावण की कथा हमें यही याद दिलाती है कि ज्ञान और पूजा-पाठ मनुष्य को स्वतः सुरक्षित नहीं कर देते, यदि उसके आचरण में नैतिकता और परोपकार की भावना का अभाव हो। देवी शक्ति का प्रतीक हैं, और शक्ति की सही आराधना वही है जहाँ साहस के साथ सदाचार और श्रद्धा के साथ संवेदना का मेल हो।
शीश नहीं, अंतर्मन झुकाइए
मंदिर की देहरी पर या किसी वेदी पर सिर झुकाने से पहले हर मनुष्य को अपने अंतर्मन में झाँककर देखना होगा कि क्या उसका हृदय सचमुच दयालु है। ईश्वर की आराधना केवल अनुष्ठान का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने भीतर के पशुत्व को त्यागकर एक करुण इंसान बनने की लंबी यात्रा है।इसलिए, आस्था रखिए पर विवेक के साथ, पूजा कीजिए पर करुणा के साथ। याद रखिए, कर्म का हिसाब सटीक है यह आज नहीं तो कल अपना निर्णय जरूर सुनाएगा।
संपादक कौशलेंद्र प्रियदर्शी की कलम से