Shrimad Bhagwat Katha: श्रीमद्भागवत कथा में गूंजा नटनागर का जयघोष, सगुना मोड़ में उतरा ब्रज का अलौकिक जन्मोत्सव, देवकीनंदन महाराज के व्यासपीठ से प्रवाहित हुई पावन ज्ञानधारा

Shrimad Bhagwat Katha: जय श्री सीताराम समर्पण ट्रस्ट के तत्वावधान में पितृपक्ष के पुण्य अवसर पर पटना के सगुना मोड़ स्थित अंशुल मैरिज हॉल के विशाल प्रांगण में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का भव्य एवं अलौकिक आयोजन हो रहा है। ...

Shrimad Bhagwat Katha
श्रीकृष्ण प्राकट्य पर झूमे श्रद्धालु- फोटो : reporter

Shrimad Bhagwat Katha:सनातन संस्कृति में श्रीमद्भागवत महापुराण का स्थान अत्यंत सर्वोपरि,पावन एवं वंदनीय है। यह ग्रंथ केवल एक पौराणिक आख्यान नहीं, अपितु वेदांत का अमूल्य सार, आध्यात्मिक चेतना का महासमुद्र तथा मानव जीवन को भवबंधन से मुक्त कराने वाली दिव्य नौका है। कलिकाल में पतित जीवों के उद्धार, अंतःकरण की शुद्धि एवं मोक्ष प्राप्ति हेतु भागवत श्रवण से उत्कृष्ट अन्य कोई साधन नहीं माना गया है। समस्त विद्याओं के आगार वेदवाणी अति गूढ़ एवं ईश्वरात्मक है। उपनिषदों में तत्त्वज्ञान की पराकाष्ठा विद्यमान है, किंतु जब तक उस ज्ञान को भक्ति रस के माध्यम से आचरण में रूपांतरित न किया जाए, वह अपूर्ण रहता है। इसी कारण श्रीमद्भागवत को समस्त निगम-कल्पतरु का गलित फल और पंचम वेद की संज्ञा प्रदान की गई है।

सगुना मोड़ में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की अलौकिक छटा

जय श्री सीताराम समर्पण ट्रस्ट के तत्वावधान में पितृपक्ष के पुण्य अवसर पर पटना के सगुना मोड़ स्थित अंशुल मैरिज हॉल के विशाल प्रांगण में श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का भव्य एवं अलौकिक आयोजन हो रहा है। कथा के पंचम दिवस व्यासपीठ पर विराजमान ओजस्वी एवं विद्वान कथावाचक श्रीदेवकीनंदन भारद्वाज जी महाराज ने परात्पर ब्रह्म भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य प्राकट्य एवं जन्मोत्सव प्रसंग का अत्यंत मार्मिक, भावपूर्ण तथा दार्शनिक विवेचन प्रस्तुत किया।

महाराज जी ने प्रसंग का विस्तार करते हुए कहा कि जब कंस के अंधकारमय कारागार में जगदाधार प्रभु का अवतरण हुआ, तब भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की निशीथ वेला में योगमाया के प्रभाव से समस्त प्रहरी मूर्छित हो गए और वसुदेव जी की लौह-श्रृंखलाएं स्वतः विमुक्त हो गईं। देवकी के परामर्शानुसार वसुदेव जी नवजात बाल-मुकुंद को वंश-पात्र  में स्थापित कर, उफनती हुई भीषण यमुना को पार करके गोकुल की ओर प्रस्थित हुए। जगदीश्वर के पावन श्रीचरणों का स्पर्श प्राप्त करते ही जलनिधि यमुना का वेग शांत हो गया। गोकुल में नंदबाबा के गृह में ७५ वर्ष की वय में पुत्र-रत्न की प्राप्ति पर संपूर्ण ब्रजमंडल महोत्सवी उल्लास एवं अनंदोत्सव में निमग्न हो गया।

दूसरी ओर, जब दुराचारी कंस ने देवकी की अष्टम संतान समझकर उस योगमाया रूपी कन्या को शिला पर पटककर हत करना चाहा, तब वह दिव्यांगना आकाशमार्ग में अंतर्धान हो गई। उसने कंस को चेताया कि उसका काल ब्रजभूमि में अवतरित हो चुका है। इस पावन झांकी तथा भजनों की मधुर स्वरलहरी पर समस्त श्रद्धालु जन भावविभोर होकर नृत्य करने लगे। संपूर्ण परिसर 'जय श्री कृष्णा' के तारसप्तक जयघोष से गुंजायमान हो उठा।

भक्ति, संस्कार एवं सामाजिक कल्याण का संदेश

 कथावाचक श्रीदेवकीनंदन भारद्वाज जी महाराज  ने अपने प्रवचन में इस तत्त्व पर विशेष बल दिया कि यदि प्रत्येक मनुष्य अपने परिवार में सनातन सुसंस्कारों का बीजारोपण करे, तो संपूर्ण राष्ट्र का अभ्युदय स्वतः सिद्ध हो जाएगा। श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से मानव मन के समस्त क्लेश, संताप, चिंता एवं मानसिक उद्वेग सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। यह पावन ग्रंथ मनुष्य को सत्य, धर्म, अहिंसा, सदाचार तथा ईश्वर के प्रति निश्छल अनुराग की शिक्षा प्रदान करता है।

नियमित कथा श्रवण एवं चरित्र में भक्ति के समावेश से परिवार में आत्मीयता, सकारात्मक ऊर्जा तथा स्थायी शांति का संचार होता है। भागवत कथा केवल पौराणिक इतिहास न होकर मानव चेतना को परिष्कृत करने वाली एक अमर ज्ञानधारा है, जो जीव को सांसारिक मोह-माया से परे पराभक्ति की ओर अग्रसर करती है।

बहरहाल भागवत कथा से मन के क्लेश, चिंता और तनाव समाप्त होते हैं। यह पावन ग्रंथ मनुष्य को सत्य, धर्म, सदाचार तथा भगवान के प्रति अनुराग सिखाता है। नियमित कथा श्रवण से परिवार में आत्मीयता, सकारात्मकता एवं शांति का संचार होता है। श्रीमद्भागवत महापुराण  समस्त विद्याओं के आगार हैं, किंतु वेदवाणी अति गूढ़ एवं ईश्वरात्मक है। बृहस्पति एवं सरस्वती जैसी महाबुद्धिमत्ता भी इसके पूर्ण रहस्य को समझने में असमर्थ है। इस लिए कथा का महत्व स्वयमं सिद्ध है। सगुना मोड़ के अंशुल हॉल में कथा की अविरल धारा 7 अक्तूबर तक बहेगी। गोता लगा लें, पता नहीं अगले पल विधाता ने क्या लिखा है....

हीरेश कुमार