2014 के लोकसभा चुनाव में खोने का नहीं था डर, 2019 में पाने के लिए कुशवाहा को करनी पड़ रही कड़ी मशक्कत

2014 के लोकसभा चुनाव में खोने का नहीं था डर, 2019 में पाने के लिए कुशवाहा को करनी पड़ रही कड़ी मशक्कत

PATNA: उपेन्द्र कुशवाहा के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव में खोने के लिए कुछ नहीं था. 2013 में नई पार्टी का गठन कर कुशवाहा ने 2014 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी के साथ हाथ मिलाया था. बीजेपी ने कुशवाहा की पार्टी को बिहार की तीन लोकसभा सीटें दी थी. मोदी लहर पर सवार होकर कुशवाहा की पार्टी ने जबर्दस्त तरीके से जीत दर्ज की. 2014 चुनाव में आरएलएसपी की जीत का स्ट्राईक रेट 100 फीसदी   रहा. कुछ पाने की चाहत में बीजेपी से हाथ मिलाने वाले उपेन्द्र कुशवाहा को चुनाव में बहुत कुछ मिल गया. उनकी पार्टी ने तीनों लोकसभा पर जीत दर्ज की. इसके बाद वे केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार में मंत्री भी बन गए.

2019 के चुनाव में खोने का भी डर

साढ़े चार साल तक केंद्र की सरकार में मंत्री रहे उपेंद्र कुशवाहा 2019 लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले एनडीए छोड़ महागठबंधन में शामिल हो गए. महागठबंधन में शामिल होने के बाद भले ही उन्हें लोकसभा की पांच सीटें मिल गयी हो, लेकिन इस बार के चुनाव में पाने के साथ-साथ खोने का भी खतरा है. क्योंकि 2014 के चुनाव में मोदी लहर पर सवार होकर कुशवाहा ने काराकाट से जीत दर्ज की थी. लेकिन इस बार के समीकरण उलट है. वहां से 2009 में जीत दर्ज किए महाबली सिंह को जदयू ने कुशवाहा के खिलाफ उतारा है. जानकार बताते हैं कि महाबली सिंह की उस इलाके में अच्छी पकड़ है. अपनी पकड़ कमजोर होते देख उपेन्द्र कुशवाहा ने काराकाट के साथ-साथ उजियारपर से भी चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है. लेकिन यहां भी उनकी राह आसान नहीं दिखती. यहां बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय से सीधी टक्कर होगी. नित्यानंद राय के लिए बीजेपी संगठन ने पूरी ताकत झोंक दी है. ऐसे में कुशवाहा के लिए काराकाट के साथ-साथ उजियारपुर में भी कड़ी मश्क्कत करनी पडेगी.

अपनी सीट के साथ-साथ बाकी 3 सीट बचाने की चुनौती

अगर कुशवाहा इस बार अपनी सीट बचाने में कामयाब हो गए तो सिकंदर बन सकते हैं. कहीं एनडीए के चक्रव्यूह में फंसकर दोनो सीट से चुनाव हार गए तो फिर कुशवाहा के लिए रास्ते कठिन हो जायेंगे. लिहाजा इस बार कुशवाहा को अपनी सीट बचाने की चिंता तो है ही बाकी की तीन सीटों पर भी आरएलएसपी की लाज बचाने की चिंता सता रही है. क्योंकि बाकी के तीन लोकसभा क्षेत्रों में से बेतिया और मोतिहारी से कुशवाहा ने बाहरी व्यक्ति को उम्मीदवार बना दिया है. कुशवाहा के निर्णय का स्थानीय स्तर पर विरोध भी किया जा रहा है.

आपका वोट ही हमें बड़ा नेता बना सकता है-कुशवाहा

उपेन्द्र कुशवाहा पर खोने का भय कुछ इस कदर है कि वे अपनी हर चुनावी सभा मे अपने वोटरों से यह कहना नहीं भूल रहे कि उपेन्द्र कुशवाहा को बड़ा नेता बनाना है तो एक-एक वोट हमारे प्रत्याशी को देना होगा. अगर आपलोग अपना एक-एक वोट महागठबंधन को नहीं दीजिएगा तो कुशवाहा नेता नहीं बनेगा. 

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