कैंसर पीड़ित शख्स को क्वारेंटाइन सेंटर में नहीं मिली जगह, खेत में तम्बू गाड़कर सपरिवार रहने को विवश

कैंसर पीड़ित शख्स को क्वारेंटाइन सेंटर में नहीं मिली जगह, खेत में तम्बू गाड़कर सपरिवार रहने को विवश

BHAGALPUR : 70 वर्षीय कैंसर पीड़ित भूदेव मंडल गांव के पास से बहने वाली नदी के तट पर तंबू गाड़ कर पूरे परीवार के साथ रहने को मजबूर हैं. वे दो परेशानियों से एक साथ जूझ रहे हैं. पहली परेशानी यह कि वह कैंसर जैसी बीमारी से लड़ रहे है और दूसरा वह दिल्ली से लौट कर आये है, इसलिए वे गांव में नहीं रह सकते.

बारिश हुई तो बदलने के लिए सूखे कपड़े नहीं मिले

लॉकडाउन के कारण बिना इलाज के दिल्ली एम्स से बैरंग लौटे कैंसर पीड़ित भूदेव मंडल अपनी हर सांस की लड़ाई लड़ रहे हैं. ऐसी स्थिति में भी दिल्ली से लौटने के कारण अब गांव से करीब एक किलोमीटर दूर नदी के पास अपने खेत में एक तिरपाल के नीचे पूरे परिवार ने खुद को क्वारेंटिन कर लिया है. भूदेव मंडल की बहु बताते हुए रुआंसी हो गई की 2 दिन पहले आई भीषण बारिश और तूफान के कारण पूरे परिवार को रात भर जगना  पड़ा था. पास में कोई ऐसा सूखा वस्त्र नहीं था, जिसे पहन कर रात गुजार सकें. छोटे से तंबू में कैंसर पीड़ित भूदेव मंडल उसका पुत्र हीरालाल मंडल, सोगिंद्र मंडल, हीरालाल मंडल की पत्नी खुशबू देवी, उसके दो छोटे छोटे बच्चे रह रहे है. भूदेव मंडल तो बीमारी के कारण खाट पर से हिल भी नहीं पाते हैं. जब तंबू में धूप पीड़ा देने लगती है, तो दोनों बेटे व बहू उन्हें खाट सहित तंबू से दूर किसी पेड़ की छांव में लेकर जाते है. शाम होने पर उन्हें पुनः तंबू में लाते हैं. 

खीरा-ककड़ी से चलता है काम

परिवार के लोगों का कहना है कि चार दिन ही बीते है. अभी और कम से कम दस दिन रहना है. तंबू के आसपास खेतों में लगे खीरा-ककड़ी आदि खा कर गुजार कर रहे हैं. 

पीड़ित बोले इलाज तो अब संभव नहीं, बची जिंदगी ठीक से गुजर जाये

चौतरफा मुसिबत झेल रहे भूदेव मंडल के पुत्र ने बताया कि अब एम्स मे इलाज बाधित हो गया तो बीमार पिता ने कहा कि अब घर ही चलो. जब मरना ही है, तो अपनी मिट्टी पर ही मरेंगे. अपने पिता की हर वक्त बढ़ती जा रही तकलीफ आखों के सामने देखा नहीं जाता. पीड़ित का कहना था कि इलाज तो अब संभव नहीं दिख रहा. बची खुची जिंदगी ही ठीक से गुजर जाए, इतनी ही इच्छा रह गई.

भूदेव का दर्द 

भूदेव मंडल के पुत्र हीरालाल मंडल ने बताया कि इलाज के लिए दिल्ली एम्स पहुंचे ही थे कि देश में कोरोना का संकट गहरा गया और लॉकडाउन लागू हो गया. एम्स में कोरोना के मरीज आने लगे और पिता का इलाज प्रभावित हो गया. आने का साधन नहीं था. तो 30 हजार रुपये में एक कार रिजर्व किया और किसी तरह 20 मई को सारथ गांव पहुंचे. दिल्ली से लौटे थे, तो क्वारेंटिन सेंटर पर रहना था. लेकिन कहीं सेंटर उपलब्ध नहीं हुआ. गांव में रहने का ठिकाना नहीं मिला तो गांव के लोगों ने गांव से अलग कहीं और रहने को कहा. कोई उपाय न होता देख नदी के पार गांव से दूर अपने खेत में ही रहने का निर्णय लिया. पैसे के अभाव के बावजूद तिरपाल खरीदना पड़ा. फिर तंबू गाड़ कर सपरिवार क्वारेंटिन हो गए.

भागलपुर से अंजनी कुमार कश्यप की रिपोर्ट 


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