अखंड अम्बेडकर ज्योति के संस्थापक आदित्य कुमार पासवान ने बिहार के विकास के लिए जातीय जनगणना को बताया जरूरी, जानें क्यों

अखंड अम्बेडकर ज्योति के संस्थापक आदित्य कुमार पासवान ने बिहार के विकास के लिए जातीय जनगणना को बताया जरूरी, जानें क्यों

पटना. अखंड अम्बेडकर ज्योति के संस्थापक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अनुसूचित जाति-जनजाति प्रकोष्ठ के आदित्य कुमार पासवान ने जातिगत जनगणना को लेकर अपना विचार रखा. इसमें उन्होंने बताया कि बिहार में जातिगत जनगणना क्यों जरूरी है...

भारत में जनगणना की शुरुआत अंग्रेजों ने 1865 में की थी, उनका मुख्य उद्देश्य भारत की आंतरिक संरचना को समझ कर और उसे गुलाम बनाए रखने के लिए जरूरी कदम उठाना मात्र था, मतलब हमारे देश में जनगणना की शुरुआत हीं हुई थी. हमें गुलाम बनाने के लिए, लेकिन 1947 में मिली आजादी के बाद आज वर्तमान में जनगणना से आशय मात्र देश के निवासियों की गिनती करना ही नहीं है, बल्कि वर्तमान में जनगणना देशवासियों के जननांकीय स्वरूप, आर्थिक गतिविधियों, सारक्षता व शिक्षा, आवास व उनमें उपलब्ध मूलभूत सुविधाएं, नगरीकरण की दशा व दिशा, जन्म व मृत्यु दर, धर्म व जातिगत संरचना इत्यादि महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों का सबसे विश्वसनीय स्रोत है.

जनगणना की सहायता से सरकारें अपने सामाजिक सरोकार के कार्यक्रमों को लागू करती हैं. जनगणना के आंकड़ों की सहायता से सरकारें और देशवासी यह देखते हैं कि देश ने किन-किन क्षेत्रों में तरक्की की है और किन क्षेत्रों में अभी और तरक्की की जरूरत है. सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बात है कि जनसंख्या के आंकड़ों से भारत में पंचवर्षीय योजनाएं तैयार की जाती है. लेकिन हमारे बिहार में जनगणना का मुख्य उद्देश्य अंग्रेजों की तरह शासन करना ही है, हमारे बिहार के सभी राजनीतिक पार्टियों को यह जानने की उत्सुकता है कि बिहार में कौन सी जाति की जनसंख्या कितनी है, क्योंकि इन राजनीतिक दलों का उदय ही जाति के आधार पर हुआ है और फिर बिहार यह राजनेता बिहार में चिल्ला चिल्ला कर यह बताएंगे कि मेरी जाति की जनसंख्या कितनी है, इसलिए तुम मुझे सत्ता में भागीदारी दो और उस जाति के नाम पर यह खुद मलाई खाएंगे और जाति की स्थिति और दयनीय हो जाएगी, यही इनका मुख्य उद्देश है.

हमारे राजनेताओं ने तर्क दिया कि बिहार के विकास के लिए जातिगत जनगणना बहुत जरूरी है, हां यह मैं भी मानता हूं कि बिहार के विकास के लिए जातिगत जनगणना बहुत जरूरी है. तो आइए  पिछले 30 सालों में बिहार में हुए कुछ अभूतपूर्व विकास में किस जाति की कितनी हिस्सेदारी है, उसकी जनगणना करने की कोशिश करते है:-

शिक्षा:- चाणक्य, गौतम बुद्ध, आर्यभट्ट और नालंदा विश्वविद्यालय को पहचान देने वाली ज्ञान की धरती बिहार में शिक्षा का आलम यह है कि योग्य शिक्षकों की कमी से जूझ रही "खिचड़ी " पर आधारित प्राथमिक शिक्षा जो पूर्णता ध्वस्त हो चुकी है, हाई स्कूलों में केवल परीक्षाएं होती हैं और जिसे विषय का नाम भी नहीं पता होता हैं, वह बिहार बोर्ड का टॉपर बनता है. विश्वविद्यालय 8 सालों में स्नातक की डिग्री देते हैं, आईटीआई और पॉलिटेक्निक कॉलेजों के नाम पर केवल बिल्डिंग खड़ी है, इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा का आलम यह है कि इसमें प्रवेश के लिए प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करने के लिए भी बच्चों को कोटा, दिल्ली या अन्य जगह जाना पड़ता है. उस शिक्षा व्यवस्था ने किस जाति के कितने छात्रों का भविष्य बर्बाद  किया है?? इसकी जातिगत जनगणना होनी चाहिए.

स्वास्थ:- प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेजों तक भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी स्वास्थ्य सुविधाएं बिहार में किसी अभिशाप से कम नहीं है, अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स, दवाई, ऑक्सीजन, बेड और व्यवस्था के नाम पर केवल खाली कुर्सी और इमारत ही है. हर साल डॉक्टरों की लापरवाही से अस्पतालों की कुप्रबंधन से बिहार के लाखों लोग अपनी जान गवातें हैं, "चमकी बुखार" अपनी जिंदगी की शुरुआत करने से पहले ही हर साल हजारों बच्चों को निगल जाती है. क्रोना की भयावहता ने सिस्टम के गाल पर तमाचा मारते हुए बिहार से लाखों लोगों को छीन लिया.

कहीं अस्पताल में बेड नहीं था, कहीं सुई दवाई नहीं थी, तो कहीं ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे मरीजों के परिजनों से उनकी "अस्मिता" तक की मांग बिहार के अस्पतालों में होती रही, सरकारी से लेकर प्राइवेट अस्पतालों में जनता को खूब लूटा गया, लोगों का न पैसा बचा न जान, अराजक स्वास्थ्य व्यवस्था ने बिहार से लाखों  जिंदगियां हर साल छीन लेती है, लाखों यतीम बच्चे, लाखों वेवा औरतें, बेसहारा माँ-बाप यह जानना चाहती है कि पिछले 30 सालों में इस स्वास्थ्य महकमे ने बिहार की किस जाति के कितने लोगों की जान ली है? इसलिए यह जातिगत जनगणना जरूरी है.

बाढ़:- बिहार के लिए अभिशाप बन चुके सरकार प्रायोजित "बाढ़" जो बिहार के  करोड़ों लोगों के जीवन के को तहस-नहस कर देती है, लाखों बच्चों का भविष्य अधर में पड़ जाता है, लाखों गरीबों की झोपड़ियां जल समाधि ले लेती है. गरीबों के जीवन यापन में सहायक सिद्ध होने वाले लाखों मवेशी डूब जाते हैं या भूख से मर जाते हैं, लाखों लोग अपना घरवार छोड़ अपने जीवन भर की कमाई पूंजी को छोड़, अपने बच्चों के साथ उचे स्थानों पर यायावर की तरह जिंदगी व्यतीत करने को मजबूर हो जाते हैं और यह सब हर साल होता है और इसका केवल और केवल एक कारण है सरकार की "आपदा को अवसर में बदलने की योजना," लोगों के मुंह से निवाला छीनने वाली सरकार और सरकार के अधिकारियों के लिए यह आपदा किसी अवसर से कम नहीं आती है, हर साल बांध की मरम्मत ई पर करोड़ों खर्च होते हैं और मरम्मती  उसकी होती है, जो एक दिन के बरसात में टूट जाती है और फिर  शुरू होता है.

बाढ़ राहत के नाम पर अरबों रुपयों की बंदर बाट का खेल जो इस आपदा को अवसर में बदल देता है. ये करोड़ों बाढ़ पीड़ित यह जानने के लिए उत्सुक है कि सरकार प्रायोजित इस बाढ़ से किस जाति के कितने लोगों का कितना नुकसान हर साल होता है?? इसलिए या जातिगत जनगणना बहुत जरूरी है.

कानून व्यवस्था:- कानून व्यवस्था तो ऐसी है कि आप घर से निकलते जरूर हैं, मगर घर पहुंचेंगे कि नहीं यह अपराधियों के ऊपर निर्भर करता है, चोरी, डकैती, लूट, हत्या, बलात्कार जैसी घटनाएं तो बिहार में आम बात है, प्रशासन का काम अब कानून व्यवस्था को छोड़ शराब बेचने का हो गया है,  और कानून व्यवस्था का जिम्मा अपराधियों ने ले रखा है. बिहार की जनता यह जानना चाहती है कि पिछले 30 सालों में हत्या, लूट, बलात्कार, चोरी, अपहरण जैसे अपराधों में किस जाति के कितने पीड़ित व्यक्ति हैं ? इसलिए यह जातिगत जनगणना जरूरी है.

महिला सुरक्षा:- "जहाँ रक्षक ही भक्षक बन जाए",उस प्रदेश में महिलाओं की क्या स्थिति होगी यह तो आप खुद ही समझ सकते हैं, मुजफ्फरपुर बालिका शेल्टर होम कांड तो आपको याद ही होगा, यह तो महज एक छोटी घटना है, बिहार में हर साल सैकड़ों बेटियों को दहेज के नाम पर जला दिया जाता है, लाखों बेटियों का  बलात्कार हो जाता है, करोड़ों बेटियां जन्म से पहले ही गर्भ में मार दी जाती है. उस बिहार में यह जानने के लिए कि किस जाति की कितनी बेटियों का हर साल रेप होता है, कितनी बेटियां दहेज के लिए जलाई जाती है और मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड में किस जाति की कितनी बच्चियों की स्मिता का सौदा सरकार ने किया?? जाति आधारित जनगणना जरूरी है.

उद्योग:- आपने उद्योग को शहर में बसते तो देखा होगा मगर, उद्योग के लिए शहर बसे यह बहुत कम देखा और सुना होगा, कालांतर में बिहार को यह गौरव हासिल है कि बिहार में जमशेदपुर और बोकारो जैसे शहर उद्योग के लिए ही स्थापित की गई थी, बंटवारे के बाद भी बिहार में कई चीनी मिलें, जुट मिलें, भागलपुर का सिल्क उद्योग,उ र्वरक की फैक्ट्री, रेल का कारखाना और भी बहुत सी औद्योगिक इकाइयां थी जिन्हें पिछले 30 सालों में धीरे-धीरे करके सरकार के द्वारा नष्ट कर दिया गया. उद्योग होंगे तो रोजगार मिलेगा, रोजगार होगी तो शिक्षा और स्वास्थ्य बढ़िया होगा, शिक्षा और स्वास्थ्य बढ़िया होगा तो आपका लाइफस्टाइल अच्छे से गुजरेगा, मगर सरकार को यह कतई मंजूर नहीं है कि बिहार में उद्योग स्थापित हो, इसलिए सरकारों ने नई उद्योग स्थापित करना तो बहुत दूर परंपरागत रूप से चली आ रही उद्योगों को भी तहस-नहस कर दिया. बिहार को यह जानने का हक है कि इन उद्योगों की बर्बादी से किस जाति को कितना नुकसान हुआ?? इसलिए जातिगत जनगणना जरूरी है.

रोजगार:- ज्ञान की धरती बिहार अब मजदूरों की धरती बनकर रह गई है, ना बिहार में कल का खाने हैं, ना उद्योग धंधे, सरकार के पास नौकरी नहीं है, युवाओं के पास हुनर नहीं है, अबे बिहार के युवा रोजगार की तलाश में दिल्ली मुंबई जैसे बड़े औद्योगिक शहरों की तरफ रुख करते हैं, जहां उनके साथ जानवरों से भी बदतर सलूक की जाती है, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण आपने लॉकडाउन के समय बिहार के मजदूरों को दूसरे प्रदेशों से तपती दोपहरी में हजारों किलोमीटर पैदल चलकर अपने घर आते हुए तो देखा हीं  होगा? बिहार में रोजगार का अवसर ना होना, इसकी जिम्मेवारी किसकी है?? इसलिए बिहार की जनता यह जानना चाहती है कि दूसरे प्रदेशों में जानवरों से भी बदतर जिंदगी गुजारने वाले इन मजदूरों में किस जाति की कितनी हिस्सेदारी है?? इसलिए जातिगत  जनगणना जरूरी है.

सरकारी नौकरी:- सरकारी नौकरियों का आलम तो यह है कि अब मंत्रालय और सचिवालय भी ठेके पर चल रहे हैं, रिक्तियां निकलती है, विज्ञापन छपते हैं, परीक्षाएं होती है, नौकरिया भी बांटी जाती है, मगर  चपरासी से लेकर एसडीओ तक हर सीट की कीमत तय होती है. आप मे सारी योग्यताएँ है फिर भी अपने लिए एक सीट खरीदने का पैसा नहीं है तो आपको बिहार में नौकरी नहीं मिल सकती है. तो फिर बिहार यह जानना चाहता है कि पिछले 30 साल में सरकारी नौकरियों में किस जाति की कितनी हिस्सेदारी रही और वह कौन सी जातियां हैं जिसके योग्य बच्चे भी अपने लिए एक अदद सीट नहीं खरीद सके. इसलिए जातिगत जनगणना जरूरी है.

गरीबी:- विकास के पैमाने पर सबसे नीचे खड़ा बिहार, ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या में सबसे उपड़ खड़ा है, मज़े की बात यह है कि गरीबों के नाम पर राजनीति करने वाले और गरीबों के मसीहा बनने वाले नेता लोग खुद अरबपति बन गए मगर समाज से ग़रीबी नहीं मिटी. आजादी के बाद से बिहार ने अगर किसी एक क्षेत्र में तरक्की किया है तो वह है ग़रीबी और भुखमरी से पीड़ितों की संख्या में, जिसमें लगातार वृद्धि हुई है. किस जाती के कितने लोग ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को मजबूर है और पिछले 30 सालों में भुखमरी से किस जाती के कितने लोग मरे हैं. यह जानने के लिए बिहार में जातिगत जनगणना जरूरी है.

जिस प्रदेश का मुखिया से लेकर मुख्यमंत्री तक, चपरासी से लेकर  मुख्य सचिव तक भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबा हो, जहां की आम जनता गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने पर मजबूर हो, जहां का आधा हिस्सा हर साल सरकारी बाढ़ से तबाह हो जाता हो, जहां नौकरियों की एक-एक सीट सत्ता में बैठे लोग बेच लेते हो, जहां का बेरोजगारी दर देश में सबसे ऊपर हो, जहाँ कि शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी हो, उद्योग धंधा के नाम पर सुई का कारखाना ना हो, दुनिया को देने के लिए मजदूर के सिवाय जिस बिहार के पास कुछ ना हो, उस बिहार के विकास के लिए जातिगत जनगणना बहुत जरूरी है. सता की मलाई खाने के लिए और बिहार को लूटने के लिए जातिगत जनगणना बहुत जरूरी है.


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