आखिर क्यों चुनाव हार रहे हैं बिहार के 80 प्रतिशत मुखिया जी? ग्राम पंचायत चुनाव में हो रहे भारी उलटफेर के कारणों को जानिये विस्तार से

आखिर क्यों चुनाव हार रहे हैं बिहार के 80 प्रतिशत मुखिया जी? ग्राम पंचायत चुनाव में हो रहे भारी उलटफेर के कारणों को जानिये विस्तार से

Desk. लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई ग्राम पंचायत सरकार होती है, जिसके कंधे पर ग्रामीण भारत के विकास की  जिम्मेवारी होती है. बिहार में इन दिनों त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव जारी है. कुल 11 चरणों में चुनाव होने हैं, जिसमें कई चरण समाप्त हो चुके हैं. पहले चरण के चुनाव से अब तक एक ट्रेंड बना हुआ है कि लगभग 80 प्रतिशत से ज्यादा वर्तमान मुखिया अपनी सीट बचाने में असफल हो रहे हैं. मतलब 80 प्रततिशत से ज्यादा मुखिया चुनाव हार रहे हैं, आखिर ऐसा क्यों है?

वर्तमान मुखिया चुनाव हारेंगे यह तो निश्चित ही था, क्योंकि इसकी सुगबुगाहट पिछले विधानसभा चुनाव में मिल चुकी थी, जब सत्तारूढ़ दल के लगभग आधे से ज्यादा विधायक चुनाव हार गए थे और 15 सालों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे नीतीश कुमार की पार्टी के महज 43 सीटों पर सिमट गई थी. मतलब साफ था कि कहीं न कहीं जनता में वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ काफी आक्रोश है, तो क्या यही आक्रोश मुखिया जी लोगों पर भारी पड़ रही है? नहीं, सरकार के खिलाफ जनमत मुखिया पर भारी नहीं पड़ रही है, मुखिया के खिलाफ जनमत सरकार पर भारी पड़ गई थी,पंचायत में चल रही विकास की योजनाएं आपकी पंचायत को सुदृढ़ करने के लिए होती है, जैसे:- नलजल, शौचालय, मनरेगा, गलीनाली, प्रधानमंत्री आवास योजना, वृद्धा विधवा विकलांग पेंशन योजना वैसी महत्वपूर्ण योजनाएं हैं, जिसे गांव की दशा और दिशा बदलने के लिए केंद्र व राज्य सरकार चला रही हैं. ये योजनाएं चल तो रही है मगर धरातल पर इनकी क्या स्थिति है आप सभी से छुपी नहीं है.


नल जल योजना

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय का सबसे प्रमुख निश्चय नल जल योजना, जिसका प्रमुख उद्देश्य था हर घर में नल से पीने का शुद्ध पानी पहुंचाना, मगर हाय रे योजना की किस्मत की इसके क्रियान्वयन की जिम्मेवारी माननीय मुखिया जी के लोगों और वार्ड पार्षदों तक पहुंच गई. हाल यह रहा कि  50 प्रतिशत कमीशन लेकर काम ठेकेदारों को दिया गया. फलस्वरूप बिहार के 95 प्रतिशत घरों में नल का जल नहीं पहुंचा. कहीं या तो नल ही नहीं पहुंचा या कहीं नल पहुंच भी गया तो उसमें जल नहीं आया. भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबी यह योजना मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के विधायकों के हार के साथ-साथ मुखिया जी लोगों के हार का सबसे प्रमुख कारण है.

शौचालय निर्माण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का देश को खुले में शौच से मुक्ति दिलाने का सबसे अहम योजना, "हर घर शौचालय निर्माण" योजना जिसके तहत हर घर को शौचालय निर्माण करने के लिए 12 हजार रुपये की राशि दी जा रही थी. मजे की बात यह है कि बिहार में 10 प्रतिशत भी शौचालय का निर्माण नहीं हुआ है और पूरा बिहार खुले में शौच मुक्त घोषित हो गया है. लूट की स्थिति ऐसी की, महज 12 हजार रुपये की योजना में भी 3 से 4 हजार रुपये तक घूस लिये गये. योजना की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गांव की महिलाएं तो यह कहती है कि "मुखिया जी शौचालय खा गए".

प्रधानमंत्री आवास योजना

2021 तक हर घर छत का हो, यह सपना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देखा था, जिसे हकीकत का अमलीजामा पहनाने का जिम्मा पंचायती राज व्यवस्था को था. इस योजना के तहत मिलने वाली 1.5 लाख रुपये की राशि में महज 30 से 40 हजार रुपये हर घर पर मुखिया जी लोगों का कमीशन है. अब आप खुद ही कल्पना कर लीजिए कि एक लाख रुपये में कौन सा प्रधानमंत्री आवास योजना बनेगा. इस योजना के तहत आवंटित घरों में 50 से 60 प्रतिशत वैसे लाभार्थी है, जिनका पहले से छत का घर है. मतलब स्कीम लीजिए और आधा आधा बांट लीजिए. ऐसे में कैसे पूरा होगा प्रधानमंत्री का हर घर छत का सपना? 

मनरेगा

कुबेर का वह खजाना जो कभी खत्म ही नहीं होता. सही सुना आपने "मनरेगा" वह योजना है, जिसके तहत आमदनी कभी खत्म ही नहीं होती. मुखिया जी लोग चाहे जितना काम करा सके इस योजना से कराने की छूट है. यह एकमात्र योजना है, जो मुखिया को विधायक से ज्यादा फंड देती है. हकीकत यह है कि 100 दिन का रोजगार तो किसी पंचायत में 100 लोगों को भी नहीं मिलता और जॉब कार्ड तो हजार-दो हजार लोगों के पास हर पंचायत में बना हुआ है. केवल पैसे खाते में आते हैं. निकालकर मुखिया जी ले जाते हैं. ऐसे में लाभार्थी को पांच से 10 प्रतिशत ही राशि का मिलता है. बाकी की 90 प्रतिशत राशि मुखिया जी के घर चली जाती है.

गली नाली

गांव की संकीर्ण गलियों से नाली के माध्यम से जल निकासी करते हुए उस नाली के ऊपर से सड़क बनाकर उस गली में रास्ता सुगम करने की यह योजना जैसे नाली में ही भाग गई हो ना तो किसी गली में नाली मिला और ना बना गली. विकास की यह कुछ ऐसी योजनाएं हैं, जिसके तहत गांव को विकसित बनाने का सपना देश के प्रधानमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री ने देखा था और इसकी जिम्मा भी उस गांव को ही सौंपा था, जिससे पंचायत का विकास होना था, मगर साइकिल से चलने वाले मुखिया जी हाथ पैर जोड़कर जब चुनाव जीत गए, विकास के बड़े-बड़े वादों और बड़े-बड़े नारों के साथ पंचायत के विकास की बागडोर जब ग्रामीणों ने उनके हाथ सौंप दी, तब पंचायत का विकास हुआ या नहीं हुआ लेकिन महज 5 साल में मुखिया जी लोगों के पास तीन मंजिला घर, स्कॉर्पियो गाड़ी, दो-चार बॉडीगार्ड, 10-20 करोड़ के ठेके, बड़े-बड़े व्यवसाय शुरू हो गए और यह सब कुछ हुआ उसी विकास के वादे के तहत जिसका वादा करके मुखिया जी चुनाव जीते थे.

यानी विकास तो हुआ, लोगों ने भी देखा, मगर पंचायत का नहीं, मुखिया जी लोगों का और यही विकास है जिसकी वजह से 80 प्रतिशत  से भी ज्यादा मुखिया अपनी सीट बचाने में असफल हो रहें हैं. लेकिन 20 परसेंट वैसे भी मुखिया है, जिन्होंने कुछ हद तक अपने पंचायत में विकास का काम किया और लोगों का भरोसा जीता और उस भरोसे के बदौलत ही आज वह सफल भी हो रहे हैं. इसलिए पंचायत की जनता की यह जवाबदेही हो जाती है कि वह अपना मतदान किसे करें, बिहार में शराब बंद है फिर भी पंचायत चुनाव में शराब धरेले से बाटी जा रही हैं, पैसे बांटे जा रहे हैं, पैसे और शराब के बल पर अगर आप वोट करेंगे तो माफ कीजिएगा आप ऐसे ही मुखिया चुनेंगे जो आपके पंचायत का नहीं खुद का विकास करेगा जैसे केंद्र और राज्य की सरकारें अगर काम नहीं करती है तो आप बदल देते हैं वैसे ही आप पंचायत की सरकारों को भी बदल रहे हैं मगर सही प्रतिनिधि चुनने की जवाबदेही भी आपकी ही है इसलिए सजग रहें सही चुने और समय-समय पर सवाल करें 5 साल इंतजार ना करें.

यह विचार लेखक का व्यक्तिगत है.

लेखक:- आदित्य कु पासवान (भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, अनुसूचित जाति विभाग, बिहार) 

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