चुनाव जीत कर भी हार गए ‘नेताजी’, हस्तिनापुर से वापस लौटने के बाद क्षेत्र में चर्चा जोरों पर

चुनाव जीत कर भी हार गए ‘नेताजी’, हस्तिनापुर से वापस लौटने के बाद क्षेत्र में चर्चा जोरों पर

PATNA :   बिहार के एक बड़े नेताजी के संसदीय क्षेत्र में चर्चा जोरों पर है कि नेताजी चुनाव जीत कर भी हार गए।आखिर चर्चा हो भी क्यों नहीं...क्यों कि इसके पहले नेताजी को हस्तिनापुर में बड़ी कुर्सी मिली थी। नेताजी और उनके खास समर्थक इसी आश में थे कि इस बार भी वही या उसके समानांतर अगल-बगल वाली कुर्सी मिल जाएगी। बड़ी आश लिए काउंटिंग के दिन हीं नेताजी भागे-भागे हस्तिनापुर पहुंचे थे। उनके पीछे-पीछे उनके खास लोग भी हस्तिनापुर पहुंच गए थे। उनके जानने वाले लोग बताते हैं कि नेताजी हस्तिनापुर पहुंचकर जर्बदस्त रूप से लॉबिंग की। लेकिन इस बार कुर्सी पाने की इच्छा अधूरी रह गयी।

विरोधियों के सामने शर्मिंदगी महसूस कर रहे समर्थक

नेताजी के समर्थक और उनके प्रशंसक विरोधियों के सामने शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं।विरोधी कुर्सी नहीं पानें पर कमेंट कर रहे हैं। अब उनके समर्थक और संसदीय क्षेत्र के प्रशंसक यह कह रहे हैं कि इससे अच्छा होता है कि वे चुनाव हार हीं जाते।तब यह कहने को नहीं मिलता कि हस्तीनापुर में इस बार वजीर वाली कुर्सी छिन गयी।

आहत नेताजी की तबीयत हो गयी थी नासाज

जानकार बताते हैं कि इस बार कुर्सी नहीं मिलने से आहत नेता जी की तबीयत भी थोड़ी नासाज हो गयी थी।करीब 13 दिनों बाद वे वापस अपने संसदीय क्षेत्र में आ गए। बताया जाता है कि वे 11 जून को क्षेत्र में आए हैं और आजतक वहीं हैं। इस बार क्षेत्र के लोग में भी उनकी जीत को लेकर कोई खास उत्साह नहीं है।इसके पहले लगातार अभिनंदन समारोह का दौर चलता था।लेकिन इस बार सिर्फ 12 जून को नेताजी का अभिनंदन हुआ। उनके कार्यक्रम में भी समर्थक कह रहे कि इस जीत में भी हार की बू आ रही है।

खबर के अनुसार नेता जी के कुछ खास समर्थकों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश कार्यकर्ता इस बात से खुश हैं कि नेता जी को इस बार वजीर की कुर्सी नहीं मिली।क्यों कि 5 साल तक क्षेत्र के लोगों ने नेताजी को बतौर वजीर के रूप में काम देख चुके हैं।

विवेकानंद की रिपोर्ट

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