मोकामा -गोपालगंज उपचुनाव परिणाम के बाद अब नीतीश-तेजस्वी के सहयोगी क्यों कह रहे ... सावधान हो जाएं, परेशानी होगी

मोकामा -गोपालगंज उपचुनाव परिणाम के बाद अब नीतीश-तेजस्वी के सहयोगी क्यों कह रहे ... सावधान हो जाएं, परेशानी होगी

पटना. पिछले सप्ताह दो विधानसभा क्षेत्रों मोकामा और गोपालगंज के उपचुनाव परिणाम के बाद महागठबंधन की टेंशन बढ़ गई है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन में शामिल सात दलों की ओर से अब इसे बयानबाजी भी शुरू हो गई है. दरअसल, मोकामा में भले राजद प्रत्याशी नीलम देवी करीब 17 हजार वोटों से चुनाव जीत गई लेकिन जिस तरह से वहां महागठबंधन के परम्परागत वोटों में बिखड़ाव हुआ है इससे जदयू की चिंता बढ़ गई है. इसी को लेकर वामदलों ने आगाह किया है. इसी तरह गोपालगंज में सात दलों के साझा चुनाव लड़ने के भी राजद उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा. यानी सारी ताकत लगाकर भी भाजपा को रोकने में सफल नहीं रहे. 

विधानसभा उपचुनाव परिणाम के बाद पहली बार वामदलों ने सरकार के मुखिया नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव को चेताया है. महागठबंधन सरकार को समर्थन दे रहे भाकपा माले ने कहा है कि गोपालगंज और मोकामा उपचुनाव के परिणाम में महागठबंधन सरकार के प्रति जनता की नाराजगी की झलक मिली है. सरकार सावधान हो जाए और वह जनता से किए गए वादे को पूरा करे. वामदलों का मानना है कि मोकामा में भाजपा उम्मीदवार को करीब 63 हजार वोट आए जबकि गोपालगंज में भाजपा जीत गई. यह दिखाता है कि भाजपा जमीनी स्तर पर मजबूत हुई है. 


मोकामा में नीलम देवी को मिली जीत के पीछे भी माना गया कि उनके पति जेल में बंद अनंत सिंह की छवि का इस चुनाव पर बड़ा असर पड़ा. यहां तक कि धानुक वोट बड़े स्तर पर भाजपा की ओर गया जबकि इसे नीतीश कुमार का कुर्मी वोट के तौर पर देखा जाता है. इसी का परिणाम रहा कि मोकामा में भाजपा अब तक का सर्वाधिक वोट लाने में सफल रही. वहीं गोपालगंज में लाख कोशिशों के बाद भी महागठबंधन भाजपा को हराने में सफल नहीं हुई. इससे दोनों जगहों पर संदेश गया कि भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ी है. यही महागठबंधन की चिंता का विषय है. 

अब माले महासचिव दीपांकर भटाचार्य ने कहा, ”बिहार में महागठबंधन सरकार से एक नई उम्मीद जगी, लेकिन सरकार आम लोगों को लगातार निराश ही कर रही है. शिक्षकों की बहाली पर अब तक किसी भी प्रकार की कदम नहीं उठाया गया है. इसके खिलाफ युवाओं में लगातार आक्रोश देखा जा रहा है.” बिना वैकल्पिक आवास की व्यवस्था किए गरीबों को उजाड़े जाने पर भी माले महासचिव ने चिंता जाहिर की और कहा कि सरकार से वार्ता के बाद भी जगह जगह गरीबों की झोपड़ियां पर बुलडोजर चल रहे हैं.

ऐसे में दीपांकर भटाचार्य का यह बयान एक प्रकार से उस कटु सच्चाई को स्वीकरना है जिसे राजद-जदयू की ओर से दरकिनार किया जा रहा है. अगर दोनों चुनाव परिणाम पर गौर करें तो यह साफ दिखाता है कि महागठबंधन के खाते में जिस प्रकार का वोट बैंक का इतिहास रहा है वह इस उपचुनाव में उनके उम्मीदवारों के लिए एकजुट नहीं हो पाया. ऐसे में अब कुढ़नी विधानसभा उपचुनाव भी एक नई चुनौती होगी. इसमें भाजपा और महागठबंधन का प्रदर्शन यह तय करेगा कि दीपांकर भटाचार्य जिस खतरे को लेकर आगाह कर रहे हैं वह किस हद तक सही है. 


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