भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार जयकांत सिंह जय बोले- लिपि भाषा का लिबास है

भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार जयकांत सिंह जय बोले- लिपि भाषा का लिबास है

PATNA : लिपि भाषा का लिबास है। भारत में मुख्य रूप से दो ही लिपि थी ब्राह्मी और खरोष्ठी । देवनागरी बाद में आई। देवनागरी संस्कृत की लिपि है न कि हिंदी की। 1873 के बाद हिंदी ने अपना स्वरूप विस्तार किया तो देवनागरी को प्रचलित करना शुरू किया। शेरशाह सूरी के समय तक भोजपुरी का लेखन कैथी लिपि में होता था। ये बातें भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार जयकांत सिंह 'जय'  ने प्रभा खेतान फाउंडेशन, मसि इंक द्वारा आयोजित एंव श्री सीमेंट द्वारा प्रायोजित आखर नामक कार्यक्रम में बातचीत के दौरान कही। पुलवामा हमले में शहीद 44 सीआरपीएफ जवानों को मौन व्रत रखकर श्रधांजलि दी गयी। 

इसके बाद भोजपुरी के साहित्यकार ब्रज भूषण मिश्र जी और हिंदी साहित्य के कथाकार और नाटककार हृषिकेश सुलभ जी ने हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार नामवर सिंह जी पर अपने संस्मरण सुना कर उन्हें याद किया और 1 मिनट का मौन रखा गया।

भोजपुरी के प्रसिद्ध साहित्यकार जय कांत सिंह जय ने कहा कि भोजपुरी अध्ययन अध्यापन की स्थिति और संस्थानों का योगदान वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय और जय प्रकाश विश्वविद्यालय ने योजनाबद्ध तरीके से अध्यापन का कार्य नहीं शुरू किया। इसीलिए सीनेट और यूजीसी ने इसे मान्यता नहीं दिया। नालन्दा ओपन यूनिवर्सिटी में भी फैकेल्टी नहीं होने के कारण पढ़ाई बंद हो गयी। बीएचयू और लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई शुरू हुआ है लेकिन भोजपुरी के बदले हिंदी में ही  पढ़ाई नहीं हो रही है वहां मौलिक भोजपुरी की पढ़ाई का अभाव है। 

भोजपुरी गद्य के उद्भव और विकास पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि भाषा का जन्म ही गद्य में ही होता है । 1664 से ही भोजपुरी में गद्य लिखना जारी है 1942 में राहुल सांस्कृत्यायन ने जेल से ही भोजपुरी भाषा में गद्य लिखें । आये दिन रोज भोजपुरी भाषा में किताबें तो आ रही है लेकिन व्यवस्थित ढंग से प्रकाशक और वितरक का घोर अभाव रहता है। अपनी कहानी के लेखन के प्रक्रिया में उन्होंने कहा कि कहानी सबके भीतर होती है । मैं अपने मन की ही अभिव्यक्ति को कहानी बना देता हूँ। 

श्रोताओं से प्रश्न के दौरान उन्होंने कहा कि भारत सरकार का भाषा संवर्धन के प्रति कोई नीतिगत योजना नहीं है। कार्यक्रम के अंत में भोजपुरी भाषा के मशहूर व्यंगकार और ग़ज़लकार राम दीप पाण्डे "अकेला" जी जो इसी महीने देह त्याग गए उनको यशवंत मिश्रा जी ने अपनी संवेदनाओं से उन्हें याद किया। इस कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन मसि इंक की संस्थापक और निदेशक आराधना प्रधान ने किया।

इस कार्यक्रम में उपन्यासकार रत्नेश्वर सिंह, भगवती प्रसाद, हृषिकेश सुलभ, कौशल महोब्बतपुरी , डॉ. रंजन विकास , अन्विता प्रधान, शाहनवाज खान आदि लोग उपस्थित थे।

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