बिहार के वो सात सपूत जो आज़ाद हिन्द के लिए शहीद हुए

बिहार के वो सात सपूत जो आज़ाद हिन्द के लिए शहीद हुए

76 साल पहले आज़ाद देश का सपना संजोए बिहार के सात बहादुर बेटों ने अपनी जान गवा दी. आज ही दिन 1942 में ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देते हुए सूबे के सात लाल पुलिस की गोलियों से छलनी कर दिए गए थे. ये वो वक्त था जब बापू का भारत छोड़ो आंदोलन पुरे देश में फैल गया था और इसका असर बिहार में भी दिखने लगा था.

साल 1942 में अगस्त क्रांति के दौरान 11 अगस्त को समय दो बजे पटना सचिवालय पर झंडा फहराने निकले लोगों में से सातों युवा पर जिलाधिकारी डब्ल्यूजी आर्थर के आदेश पर पुलिस ने गोलियां चलाईं। झंडा लिए आगे बढ़ रहे 7 छात्रों को एक-एक कर गोलियों से भून दिया गया, जान गई लेकिन तिरंगे को जमीन पर नहीं गिरने दिया। गोलिया चलती रही लेकिन आज़ाद हिन्द के सपने को नहीं मार सके, तिरंगे को फहराने को आगे बढ़ रहे उमाकांत को भी पुलिस ने गोलियों से भुना। उन्होंने गोली लगने के बावजूद सचिवालय के गुंबद पर तिरंगा फहरा दिया।

वो सात छात्र जिन्होंने आज़ाद हिन्द के लिए अपनी जान गवाई

उमाकांत प्रसाद सिंह : राम मोहन राय सेमेनरी स्कूल में नौवीं कक्षा के छात्र थे। वह सारण जिले के नरेंद्रपुर गांव के निवासी थे।

सतीश प्रसाद झा : पटना कॉलेजिएट के 10वीं कक्षा के छात्र थे। भागलपुर जिले के खडहरा के रहने वाले थे।

रामानंद सिंह : राम मोहन राय सेमेनरी स्कूल में नौवीं कक्षा के छात्र थे। पटना जिले के शहादत गांव के रहने वाले थे।

देवीपद चौधरी : मिलर हाई स्कूल के नौवीं कक्षा के छात्र थे। सिलहट जमालपुर के रहने वाले थे।

राजेन्द्र सिंह : पटना हाई स्कूल में 10वीं कक्षा के छात्र थे। सारण जिले के बनवारी गांव के रहने वाले थे।

राम गोविंद सिंह : पुनपुन हाई स्कूल के 10वीं के छात्र थे। पटना अंतर्गत दशरथा के रहने वाले थे।

जगतपति कुमार : बीएन कॉलेज में सेकेंड इयर के स्टूडेंट थे। औरंगाबाद जिले के खराठी गांव के रहने थे।

देवीपद हाथ में तिरंगा लिए आगे बढ़े लेकिन उन्हें पुलिस की गोलियों का शिकार होना पड़ा दोस्त को गिरते देख पुनपुन के दशरथा गांव के राम गोविंद सिंह ने तिरंगे को थामा और आगे बढऩे लगे। उन्हें भी गोली का शिकार होना पड़ा। साथी को गोली लगते देख रामानंद, आगे बढ़ने लगे। उन्हें भी गोली मार दी। गर्दनीबाग उच्च विद्यालय में पढ़ने वाले छात्र राजेन्द्र सिंह तिरंगा फहराने को आगे बढ़े लेकिन वह सफल नहीं हुए। उन्हें भी गोलियों से ढेर कर दिया गया। तभी राजेन्द्र सिंह के हाथ से झंडे लेकर बीएन कॉलेज के छात्र जगतपति कुमार आगे बढ़े। जगतपति को एक गोली हाथ में लगी और दूसरी गोली छाती में तीसरी गोली जांघ में। इसके बावजूद तिरंगे को झुकने नहीं दिया।

तब तक तिरंगे को फहराने को आगे बढ़े उमाकांत। पुलिस ने उन्हें भी गोली का निशाना बनाया। उन्होंने गोली लगने के बावजूद सचिवालय के गुंबद पर तिरंगा फहरा दिया।

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