चुनावी मैदान से क्यों दूर भागते हैं बिहार के सीएम और डिप्टी सीएम, 2005 से बैकडोर से ही चल रही सियासत

चुनावी मैदान से क्यों दूर भागते हैं बिहार के सीएम और डिप्टी सीएम, 2005 से बैकडोर से ही चल रही सियासत

पटना : बिहार में विधानसभा चुनाव की सरगर्मी काफी तेज है. सियासी दल चुनावी अखाड़े में उतरने के लिए अब पूरी तरह तैयार हो चुके हैं. एनडीए ने नीतीश कुमार की अगवाई में चुनावी में उतरने का फैसला किया है. ऐसे में  नीतीश कुमार और 6 बार बिहार से सीएम बने तो बीजेपी के सुशील मोदी 3 बार डिप्टी सीएम बने. लेकिन दोनों नेताओं ने इस दौरान दोनों नेता कभी चुनाव मैदान में नहीं उतरे. 

चुनावी मैदान से क्यों दूर भागते हैं नीतीश और मोदी
सीएम नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सुशील मोदी विधान परिषद के जरिए ही सत्ता की कुर्सी तक पहुंचते रहे. लेकिन सवाल ये है कि आखिर वो कौन सी वजह है जो जनाधार और विकास पुरुष माने जाने वाले सीएम नीतीश कुमार को चुनावी मैदान में जाने से रोकती है. सीएम नीतीश कुमार ने नीतीश कुमार ने आखिरी चुनाव 2004 में लड़ा था. 2004 के लोकसभा चुनाव में नीतीश ने दो जगह नालंदा और बाढ़ से चुनाव लड़ा था. वह लगातार बाढ़ से जीतते रहे थे लेकिन 2004 के चुनाव में उन्हें बाढ़ से कुछ स्थिति डांवाडोल नजर आ रही थी. इसलिए उन्हें गृह जिला नालंदा की याद आई और उन्होंने जार्ज फर्नांडिस को मुज्जफरपुर से चुनाव लड़वाया और खुद नालंदा से लड़े. नीतीश कुमार का डर सही साबित हुआ वो बाढ़ से हार गए. हालांकि नालंदा से वे जीत गए. लेकिन लोग बताते हैं कि इस हार से नीतीश को गहरा सदमा लगा. बाढ़ लोकसभा के बख्तियारपुर से उनका गहरा नाता रहा है. वो वहीं पढ़े-बढ़े लेकिन इस हार के बाद फिर वे चुनाव नहीं लड़े. 2005 में बिहार में जेडीयू और भाजपा गठबंधन की जीत हुई तो नीतीश कुमार सांसद थे उन्होंने 2005 में सीएम का पद संभाला और लोकसभा से इस्तीफा दे दिया और एमएलसी बन गए. 2006 में सीएम नीतीश कुमार MLC बने तब से आजतक वो विधान परिषद के ही सदस्य बने रहें.


बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी के साथ भी कुछ ऐसे ही हालात हैं. 2005 में बिहार में जदयू और भाजपा गठबंधन की सरकार बनने के बाद से ही सुशील मोदी भी चुनावी अखाड़े में कभी नहीं कूदे. उससे पहले वो पटना मध्य से चुनावी ताल ठोकते थे. 1999 से 2004 तक वो विधान सभा के सदस्य रहे लेकिन 2004 में हुए लोकसभा चुनाव जीतने के बाद वो भागलपुर से सांसद बने. लेकिन 2005 में हुए विधान सभा चुनाव जदयू और बीजेपी के गठबंधन की जीत हुई. बस फिर क्या था सीएम नीतीश कुमार की तरह सुशील मोदी ने भी लोकसभा से इस्तीफा दिया और एमएलसी बनकर बिहार के डिप्टी सीएम की कुर्सी संभाल ली. ये दौर 2005 से अबतक चला आ रहा है. हालांकि बीच में कई ऐसे सियासी घटनाक्रम घटे जब डिप्टी सीएम कुर्सी उनके हाथ से गई और एमएलसी की भूमिका निभाते रहे.

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