BIRTHDAY SPECIAL: एम एस धोनी, एक संघर्ष की कहानी

BIRTHDAY SPECIAL: एम एस धोनी, एक संघर्ष की कहानी

'क्रिकेट खेलेगा? सर हमको बैटिंग ज्यादा अच्छा लगता है', और यही से शुरू हुआ माही से मिस्टर कूल तक का सफर. सपने को सच कर दिखाने की एक संघर्ष की कहानी है धोनी। छोटे से शहर में बड़े सपने लेकर निकला माही प्रेरणा का श्रोत है. आज सात जुलाई को धोनी अपना 37वां जन्मदिन मनाएंगे। धोनी ने भारतीय क्रिकेट को एक नई पहचान दी। उनकी गिनती भारत के सफलतम कप्तानों में होती है।

धोनी आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचना बस एक सपना बनकर रह जाता है। कुछ सालों पहले 300 रुपये के लिए काम करने वाले धोनी आज करोड़ों की कमाई करते हैं. धोनी दुनिया के एकलौते कप्तान हैं जिन्होंने आईसीसी की तीनों ट्रॉफी टी-20 वर्ल्ड कप, 2011 आईसीसी वर्ल्ड कप और 2013 में चैम्पियंस ट्रॉफी जीती हैं.

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जब धोनी 1992 में छठी क्लास में पढ़ रहे थे, तभी उनके स्कूल को एक विकेट कीपर की जरूरत थी, उस समय धोनी फुटबॉल के गोलकीपर हुआ करते थे। फिर वह गोलकीपर से विकेट कीपर बन गए. कहते है ना कि ज़िम्मेदारी के बोझ के निचे सपने कही ना कही दम तोड़ देते हैं. ऐसे ही कुछ माही के साथ भी हुआ जब ज़िम्मेदारी के एक टिकट कलेक्टर की नौकरी करनी पड़ी., लेकिन ज़िम्मेदारी ने सपनों पंख नहीं काट पाए.

18 साल की उम्र में धोनी ने पहली बार रणजी मैच खेला था, वह उस समय बिहार रणजी टीम की तरफ से खेलते थे। इसी दौरान धोनी की नौकरी रेलवे में टिकट कलेक्टर के रूप में लगी और उनकी पहली पोस्टिंग पश्चिम बंगाल के खड़गपुर में हुई थी। 2001 से 2003 तक धोनी ने खड़गपुर के स्टेडियम में क्रिकेट खेला हालांकि धोनी को ये नौकरी रास नहीं आई उनका इरादा तो कुछ और ही था, फिर धोनी रेलवे की टीम के लिए खेलने लगे।

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धोनी की कहानी मध्यम वर्ग को उड़ान भरने की प्रेरणा देती है. ज़िम्मेदारी से भागना नहीं है जिम्मेदारी के साथ सपनों के पीछे भागना है धोनी की कहानी 

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