क़ानूनी दांवपेंच की फ़ांस में जातीय जनगणना, नीतीश सरकार का निर्णय सही या गलत- सुप्रीम कोर्ट में 13 जनवरी को होगी अहम सुनवाई

क़ानूनी दांवपेंच की फ़ांस में जातीय जनगणना, नीतीश सरकार का निर्णय सही या गलत- सुप्रीम कोर्ट में 13 जनवरी को होगी अहम सुनवाई

पटना. बिहार में हो रही जातीय जनगणना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करने पर सहमति जताई है. अब 13 जनवरी बेहद अहम दिन होने जा रहा है क्योंकि इसी दिन सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर अहम सुनवाई होगी. बिहार में सत्ताधारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार नीत महागठबंधन सरकार की ओर से यह जातीय जनगणना कराई जा रही है. 7 जनवरी से हो रही इस जनगणना को संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ बताते हुए याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था. अब इसे लेकर शीर्ष अदालत सुनवाई करेगा और बिहार में जातीय जनगणना हो या नहीं इस पर महत्वपूर्ण फैसला आएगा. भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि वह शुक्रवार को याचिका पर सुनवाई करेगी.

सुप्रीम कोर्ट में जातीय जनगणना के खिलाफ याचिका दायर करने वाला शख्स भी सीएम नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा का ही निवासी है. याचिकाकर्ता अखिलेश कुमार ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि जाति आधारित गणना संबंधी अधिसूचना भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है. याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि यह अधिसूचना गैर कानूनी, मनमानी, अतार्किक और असंवैधानिक है. संविधान में विधि के समक्ष समानता और कानून के समान सरंक्षण का हवाला देते हुए अनुच्छेद 14 के उल्लंघन का दावा किया गया है.

अखिलेश कुमार ने अपने अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा के जरिये जनहित याचिका को दायर किया है. उन्होंने इसमें यह भी कहा है कि छह जून, 2022 को जारी अधिसूचना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करती है. इसलिए बिहार में जातीय जनगणना की अधिसूचना को रद्द किया जाए और इस काम में लगाए गये अधिकारियों को फौरन इस काम के लिए आगे बढ़ने से रोका जाए. 

बिहार में 7 जनवरी 2023 से जातीय जनगणना की शुरुआत हुई है. पहले चरण में 15 जनवरी तक मकानों की गिनती होगी. वहीं अगले चरण में अप्रैल में दूसरे चरण की गिनती होगी. इसमें परिवारों के अन्य प्रकार के विवरण लिए जाएंगे. जातीय जनगणना के मुद्दे पर बिहार में जमकर राजनीति भी हो रही है. एक ओर सीएम नीतीश और उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव इसे बड़ी उपलब्धि बता रहे हैं. साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीत केंद्र सरकार के जातीय जनगणना नहीं कराने के निर्णय को बेहद निराशाजनक बता रहे हैं. इसके उलट बिहार में विपक्षी दल भाजपा भी जातीय जनगणना को अपनी उपलब्धि बता रही है. भाजपा नेता बार बार कह रहे हैं कि उन्होंने कभी भी इसका विरोध नहीं किया. इन सबके बीच अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया है जहाँ 13 जनवरी को जातीय जनगणना के मुद्दे पर अहम फैसला होगा. 


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