आज के युवा पीढ़ी की जिंदगी सोशल मीडिया के इर्द -गिर्द , पढ़िये पूरी रिपोर्ट

आज के युवा पीढ़ी की जिंदगी सोशल मीडिया के इर्द -गिर्द , पढ़िये पूरी रिपोर्ट

DESK : हम 21 वीं शताब्दी में है जहां हर चीज डिजीटल  हो रही है, किसी से बात करने के लिए अब उतना सोचना नहीं पड़ता, किसी को देखने के लिए हफ्ते  भर का इंतज़ार नहीं करना पड़ता, शॅापिंग करनी है तो मार्केट जाने की ज़रूरत भी अब कम ही हो  गयी है क्यूंकि पहनने से लेकर खाने तक सब एक किल्क पर  उपलब्ध हो जाता है. पहले ऐसा था की अगर कोई रिश्तेदार फूफा, मामी, दीदी या कोई चाचा अगर बाहर रहते हैं तो उनसे बात करने के लिए या तो चिट्ठियाँ लिखो और अगर फ़ोन पे बात करनी है तो कभी नेटवर्क साथ नहीं देता तो कभी कुछ और बात जब  उन्हें देखने की आती थी तो  बस छुट्टियों का ही इंतज़ार करो क्यूंकि उससे पहले उन्हें देख पाना तो मुमकिन ही नहीं है. पर अब स्मार्टफोन के आने से और विभिन्न सोशल मीडिया एप के आ जाने से सब आसान हो गया है. अब न पहले जैसी नेटवर्क  को लेकर परेशानी  होती है न  उतनी  किसी अपने को देखने के लिए तरसना पड़ता है, जब मन किया विडियो कॉल कर दो. 

पहले जब किसी हीरोइन या हीरो को सुन्दर कपडे पहने देखते थे तो हमारा भी मन करता था की हम भी उनकी तरह कपडे ख़रीदें पर वो उपलब्ध नहीं रहता . अब ऐसे ऐप उपलब्ध है जैसे मि्नत्रा, अमेज़न, फ्लिप्कार्ट और न जाने ऐसे कितने ऐप है जिनपर हमारी पसंद के कपड़ो से लेकर जैव्लरी तक मिल जाती है.

लिंकिडीन, नौकिरी.कॉम ये सब ऐप अब उन युवाओ को काम ढूँड़ने का अवसर देती है जो नौकरी के लिए दर-बदर फिरते रहते है पर अपनी पसंद की नौकिरी उन्हें मिल नहीं पाती.


पर जहां एक तरफ ये सोशल मीडिया हमें अपनों से जोड़ती है वहीं कही न कही उनसे अलग भी करती है. 2019 के हुए एक शोध के मुताबिक एक औसतन इन्सान दिन के 2 घंटे और 22 मिनट सोशल मीडिया पर बिताता है और 2020 में इसकी अवधि बढ़ कर और हो गयी है. आज की युवा पीढ़ी अपने असल जिन्दगी के दोस्तों को भूल फेसबुक और इन्स्टाग्राम के दोस्तों से जादा जुड़ाव महसूस करते हैं क्यूंकि जो दोस्त उनके सामने है उनसे मिलने का उन्हें वक़्त ही नहीं होता. जहां एक तरफ ये सोशल मीडिया आपको खुद में विश्वास करना सिखाता है, पॉजिटिव होना सिखाता है वहीं दूसरी तरफ ऐसे कितने युवा है जिन्हें खुद के चेहरे पसंद नहीं आते और कॉन्फिडेंस की भी मात्रा कम ही होती जाती है क्यूंकि वो तो पूरे दिन सोशल मीडिया पर दिखावटी सुन्दरता को देखते रहते हैं. अब लोग सामने से बात करने से जादा बात तो स्नैपचैट पर कर लेते हैं. 

एक वक़्त था जब हमें यह सिखाया जाता था की अंजान लोगों से बात नहीं करनी चाहिए और आज एक वक़्त है जब अनजान लोग ही ज़िन्दगी में अधिक हैं, अपनों से ज्यादा  उनपे भरोसा करते हैं, अपनों से मिलने के लिए वक़्त नहीं है का बहाना करते हैं और अनजान से मिलने के लिए वक़्त ही वक़्त है ऐसा कहते फिरते हैं. पहले खाना, खेलना, अपनों के साथ वक़्त बिताना, एक अच्छी नौकरी और रात में चैन की नींद ज़िन्दगी का हिस्सा हुआ करती थी पर अब नींद ही किसे है क्यूंकि रात को तो देखते रहते हैं की किसने क्या पोस्ट किया है, मेरे अपलोड किये हुए पिक्चर पे कितने लाइक्स आये क्यूंकि उन्हीं लाइक्स से तो यह निश्चय होता है की आप खूबसूरत हैं, आपके दोस्त हैं. नींद की जगह ओवरथिकिंग और डिप्रेशन ने जो ले ली है तो नींद को तो गायब होना ही था. यह कहना ग़लत नहीं होगा की आज की युवा एक मखौटे में जी रही है, दूसरों के सामने तो हस्ती हैं जबकि अंदर ही अंदर वो डिप्रेस्ड होती जा रही है.  

हर चीज के कुछ फ़ायदे तो कुछ नुकसान होती ही है और सोशल मीडिया के भी फायदें बहुत है पर नुकसान....उनको भी हम दरकिनार नहीं कर सकते. सोशल मीडिया का कितना इस्तेमाल करना है और नहीं करना है वो पूरी तरह से एक इन्सान पर ही निर्भर करता है, वह कितना हमारे लिए लाभदायक है और कितना हानिकारक हम खुद समझ सकते हैं. तो इसपे  आप भी सोचिएगा ज़रूर..... 

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