शर्मनाक! वाह रे सुशासन का प्रशासन- नेता से डर है या माफियाओं से सेटिंग? खुलासा करने वाले को गोलियों से 'भून' दिया गया पर करोड़ों की 'अपनी' जमीन से नहीं हटा कब्जा

शर्मनाक! वाह रे सुशासन का प्रशासन- नेता से डर है या माफियाओं से सेटिंग? खुलासा करने वाले को गोलियों से 'भून' दिया गया पर करोड़ों की 'अपनी' जमीन से नहीं हटा कब्जा

PATNA:  बिहार में अफसरशाही भ्रष्टाचार में लिप्त है ।अफसरों की करनी का फल आमलोगों को भुगतना पड़ रहा. अफसर माफियाओं से मिल कर जमकर माल बटोर रहे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार में भी 80 फीसदी मामले जमीन विवाद से जुड़े आ रहे हैं। अधिकांश मामलों में अंचल,थाना, डीसीएलआर व एसडीओ की लापरवाही सामने आती है। ताजा मामला मोतिहारी का है जहां अफसरों ने सुशासन को तार-तार कर दिया। जिम्मेदार सरकारी सेवक किस कदर लापरवाह बने हैं या फिर उनकी भू-माफियाओं से सेटिंग है इसकी बानगी देखने को मिली है। करोड़ों की सरकारी जमीन का खुलासा करने वाले आरटीआई कार्यकर्ता की दिनदहाड़े गोली मार हत्या कर दी गई। उस बेचारे ने करोड़ों की सरकारी जमीन से कब्जा हटाने के लिए अपनी जान दे दी लेकिन आदेश के बाद भी अधिकारियों ने उस जमीन से कब्जा नहीं हटाया। हद तो तब हो गई जब अतिक्रमण हटाने के जिम्मेदार अधिकारी अवैध कब्जेधारी को कोर्ट से रिलीफ मिलने तक मोहलत दे रहे हैं। हत्या के बाद भी अफसरों के कान पर जूं नहीं रेंग रहा और थोथी दलील दे रहे। क्या इसे आप सिस्टम का बेशर्म चेहरा नहीं कहेंगे?

न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी!

मोतिहारी के हरसिद्धी में एक आरटीआई कार्यकर्ता की दस दिन पहले दिनदहाड़े ब्लॉक गेट पर गोलियों से भून दिया गया था। पिछले शुक्रवार को इस मामले का खुलासा हुआ और दो अपराधियों को गिरफ्तार किया गया . गिरफ्तारी के बाद आरटीआई एक्टिविस्ट की हत्या के पीछे जो वजह सामने आई है वो चौंकाने वाली है। मोतिहारी पुलिस की पूछताछ में यह पता चला है कि जमीन से अतिक्रमण हटाने को लेकर बिपिन अग्रवाल की हत्या कराई गई। इस काम के लिए पैसा जमा किया गया और शूटरों को हायर कर आरटीआई एक्टिविस्ट बिपिन अग्रवाल की हत्या कराई गई। इस केस में एक बड़े बीजेपी नेता का नाम आ रहा है। पुलिस ने बीजेपी नेता को घर से उठाकर रात भर थाने में पूछताछ भी की थी। फिर पीआर बॉंड पर नेताजी को छोड़ा गया था। हालांकि वे अभी भी पुलिस की रडार पर हैं। पुख्ता सबूत मिलने पर नेताजी जेल की हवा भी खा सकते हैं।

खुलासा करने वाले की जान चली गई 

 हरसिद्धी प्रखंड कार्यालय के समीप स्थित पेट्रॉल पंप को सील हुए 15 महीने बीतने को है। लेकिन आज तक इस भूमि को अतिक्रमणमुक्त नहीं किया गया। आरटीआई कार्यकर्ता विपिन अग्रवाल की हत्या के बाद ग्रामीणों में इस बात की चर्चा तेज है। अग्रवाल ने ही लोकायुक्त, पटना के पास याचिका दायर की था। जिसके फैसले आधार पर पेट्रोल पंप को 29 जून, वर्ष 20 में सील कर दिया गया था। तब अरेराज के तत्कालीन एसडीओ धीरेन्द्र कुमार मिश्रा, डीएसपी ज्योति प्रकाश, सीओ सतीश कुमार, थानाध्यक्ष शैलेन्द्र कुमार सिंह व पुलिस टीम की मौजूदगी में पेट्रोल पंप सील करने की कार्रवाई की गई थी। लोकायुक्त, पटना का निर्णय आने से पूर्व में भी पेट्रॉल पंप की 10 कट्ठा 18 धुर गैरमजरूआ भूमि की जमाबंदी उप समाहर्ता, पूर्वी चंपारण ने रद्द कर दी थी। साथ ही 11 फरवरी, वर्ष 20 को अंचलाधिकारी के पास पत्र भेजकर कार्रवाई का आदेश भी दिया था। उक्त भूमि गैर मजरुआ मालिक, खाता संख्या 93 व खेसरा संख्या 299 की जमाबंदी तीन लोगों के नाम से थी। उक्त पेट्रोल पंप बीजेपी नेता का था। जिसे लीज पर लेकर चलाया जा रहा था।

मोहलत पर मोहलत देते रहे एसडीओ-सीओ

प्रशासन शायद इस आस में रहा कि दूसरा पक्ष हाईकोर्ट से स्टे-ऑर्डर ले आएगा। मामला हाईकोर्ट भी पहुंचा है लेकिन अभी तक कोई स्टे का आदेश नहीं दिया. इसके बाद भी प्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा रहा। इस संबंध में जब हमने हरसिद्धी अंचल के अंचलाधिकारी से पूछा तो बड़ा ही हास्यास्पद बयान दिया। सीओ चन्देश्वर तिवारी ने बताया कि पेट्रॉल पम्प का अतिक्रमण हटाने के लिए लोकायुक्त द्वारा 2020 में आदेश दिया गया था। आदेश के बाद पेट्रॉल पम्प को सील कर दिया गया। पेट्रॉल पम्प संचालक लोकायुक्त के आदेश के विरुद्ध हाई कोर्ट गये। हाई कोर्ट द्वारा संचालक के रिट को बिना स्टे लगाए डीएम कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया। संचालक डीएम कोर्ट में अपील किये हुए है । वहीं हाईकोर्ट में संचालक द्वारा एलपीए किया गया है । एलपीए में प्रशासन द्वारा ओथ किया गया है । जल्द ही इसका जजमेंट मिल जाएगा ।उसके बाद कार्रवाई की जायेगी। सीओ स्वीकार कर रहे हैं कि इस केस में लोकायुक्त के आदेश पर किसी न्यायालय से स्टे नहीं मिला है। यानी अभी इंतजार किया जा रहा है कि जमीन कब्जा करने वाला शख्स किसी कोर्ट से स्टे ऑर्डर ले आये ताकी उसकी जमीन बची रह जाये। वहीं अरेराज के एसडीओ संजीव कुमार से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि लोकायुक्त के आदेश के विरुद्ध पंप संचालक हाई कोर्ट में रिट दायर किया है ।उन्होंने बताया कि हाईकोर्ट को हमलोग जबाब दिए हैं। कोर्ट के आदेश का इंतजार है। जो आदेश आएगा उसे प्रभावी किया जाएगा । मतलब साफ है कि प्रशासन इस इंतजार में है कि पंप संचालक कोर्ट से स्टे ऑर्डर ले आयेगा। 

 मलाई खाने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी पुलिस करेगी रिपोर्ट 

मोतिहारी पुलिस की जांच आगे बढ़ी है। जांच में यह बात सामने आई है कि अतिक्रमित भूमि को खाली कराने को लेकर ही हत्या की गई. इसमें उस इलाके के 4-5 प्रभावशाली लोग शामिल हैं। पुलिस की नजर उन सब पर है। सिर्फ सबूत मिलने का इंतजार किया जा रहा है। गिरफ्त में आये दो अपराधियों से पूछताछ में काफी कुछ हासिल हुआ है। दो अन्य की गिरफ्तारी के बाद सबकुछ साफ हो जाएगा। जिन दो अपराधियों की गिरफ्तारी हुई है उनमें एक ने बीजेपी नेता का नाम लिया था। इस आधार पर पुलिस ने भाजपा नेता को रातों-रात उठाकर पूछताछ भी की थी। बाद में पीआर बॉन्ड पर छोड़ा गया था। पुलिस सूत्रों से जो जानकारी मिली है उसके अनुसार हरसिद्धी में जमीन के एक प्लॉट को लेकर ही हत्या की गई है। उक्त प्लॉट को लोकायुक्त कोर्ट ने अतिक्रमण मुक्त कराने का आदेश दिया था। लेकिन प्रशासन ने पेट्रोल सील कर जमीन से अतिक्रमण नहीं हटाया। पुलिस यह मानकर चल रही है कि स्थानीय अधिकारियों की मिलीभगत से अतिक्रमण को हटाया नहीं जा सका। जबकि साफ आदेश था कि अतिक्रमण हटाई जाए। पुलिस के आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि जरूरत पड़ी तो वैसे जिम्मेदार अधिकारियों को चिन्हित कर कार्रवाई को लेकर वरीय अधिकारियों को रिपोर्ट किया जायेगा।  

अपर समाहर्ता ने जमीन को बताया गैर मजरूआ,जमाबंदी किया था रद्द

बता दें,भूमि को अतिक्रमणमुक्त कराने को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता विपिन अग्रवाल ने प्रथम बार अरेराज अनुमंडलीय लोक शिकायत निवारण पदाधिकारी के पास याचिका दायर की थी। केस में बताया था कि पेट्रोल पंप वाली जमीन गैरमजरूआ है। इसे फर्जीवाड़ा कर हड़पा गया है। यहां से जमीन की जमाबंदी रद्द करने का मामला अपर समाहर्ता मोतिहारी से होते हुए पटना में लोकायुक्त के पास पहुंचा। लोकायुक्त के फैसले के मुताबिक उक्त भूमि से पेट्रोल पंप से अतिक्रमणमुक्त कराते हुए लाइसेंस निरस्त करने की कार्रवाई करनी थी। लेकिन आज तक प्रशासन ने उस जमीन से अतिक्रमण नहीं हटाया।

बिहार के जाने-माने आरटीआई एक्टिविस्ट शिवप्रकाश राय कहते हैं कि 2010 से अब तक 20 आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या की जा चुकी है। इस राज्य में अगर किसी मामले का खुलासा करते हैं तो जान बचना मुश्किल है। राज्य सरकार का प्रशासन आरटीआई कार्यकर्ताओं को खत्म करने पर तुला है। 

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