ये कुर्सी का खेल है शाहनवाज़ साहब, अटल, आडवाणी, जॉर्ज को निबटते तो समय ही नहीं लगा, फिर आप तो ! पढ़िए निबटाने की राजनीति पर पूरी रपट.....

NEWS4NATION DESK : कलेजे में दफन दर्द, ट्वीटर के माध्यम से बाहर लाने के लिए सादर आभार शाहनवाज़ साहब। ओह! लेकिन इस दर्द में भी आपने सियासत आखिर कर ही डाला, कम से कम दर्द को बख्श दीजिये न, ये तो आपके दिल की पैदाइश है। लेकिन चलिये, सियासत में संवेदनाओं के लिये जगह नहीं होता। यह सबको पता है। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि  घर भी आपका, शतरंज भी आपका, चालें भी आपकी, मोहरे भी आपके और कत्ल भी आपका ही कर दिया जाता है! और बड़े करीन से  कत्ल का इल्जाम भी पड़ोसी पर लगा देते है, लेकिन सब पता है आपको कि आपका कब्र कब से खुद रहा है और घर के ही लोगो के द्वारा खोदा जा रहा है। चलिये कोई बात नहीं, हो सके भविष्य में कुछ जुगाड़ सेट हो जाये। राजनीति तो इसी को कहते हैं। 

आपके दर्द के प्रति हमारी सहानुभूति सौ फीसदी है। लेकिन एक मलाल भी है कि कम से कम इस दर्द को बख्श देते। क्योंकि यह दर्द आपका अपना था। आप जैसे शालीन सियासतदानों से साफगोई के लिये ही जनता आशान्वित रहती है। इल्जाम लगाना है तो खुल जाइये न कौन रोक रहा है। सब पद पर तो करीब -करीब रह ही लिए है। अब थोड़ा स्मृति पटल पर जोर डालिये, सब कुछ सिनेमा के माफिक घूमता जायेगा।

आप जिस पर इल्जाम लगा रहे है, उन्हें बिहार का राजा बने सिर्फ एक ही साल हुआ था और राजा  अपने  मेंटर यानी समाजवादी योद्धा जॉर्ज फर्नांडिस को सेट करने पर तुले हुए थे। अंततः  हुआ भी वही जो राजा चाहते थे। जॉर्ज के जंगी जहाज को राजनीति के उथले पानी में उनके शिष्यों द्वारा ही डूबो दिया गया। जॉर्ज बिलबिलाते रहे, शरद यादव को मोहरा बनाया गया, अब देखिये कैसे परजीवी राजनीति करने वाले शरद खुद लालटेन की रौशनी में राजनीति के बचे रास्ते को तय करने के लिये विवश हैं।

शाहनवाज़ साहब याद है न आपको शाइनिंग इंडिया के नाम पर भाजपा के पुरोधा अटल बिहार वाजपेयी को कैसे लौह पुरुष आडवाणी ने सेट कर दिया था। बेचारे अटलजी की बोलती ही बन्द कर दी गई थी। फिर किस्मत ने भी कुछ ऐसा ही किया कि अनन्त यात्रा पर जाने तक अटलजी सिर्फ इस खेल को देख पाने तक ही सक्षम थे।

अब आगे बढिए, आडवाणीजी को राजनीतिक संध्या वंदन के लिये कैसे मजबूर किया गया, इसके भी आप गवाह है। आडवाणी तो आपके और आपने जिन पर इल्जाम लगाया है यानी नीतीशजी के लिये बड़े ही पुरुषार्थी व सम्मानित नेता रहे हैं। लेकिन आडवाणी को जब आहत करने का खेल शुरू हुआ तो आपकी जुबान कभी नहीं खुली। अलबत्ता नीतीश ने खुल कर राजनीतिक विरोध जरूर किया, लेकिन  यहां प्रतिद्वंदिता और ईर्ष्या का खेल कुछ ज्यादा ही दिख रहा था।

गिरिराज बाबू भी दर्द बयां कर रहे है, लेकिन कार्यकर्ता बनकर। हद है, हैं नेता और बन रहे हैं कार्यकर्ता, समझिये इसी को राजनीति कहते हैं। राजनीतिज्ञ अगर नही होते तो दर्द का सत्यानाश हो जाता। धन्य हैं आपलोग दर्द में भी राजनीति तलाश लेते हैं चाहे अपना हो या पराया।

इतिहास पढ़े हैं न आप, जरा याद कीजिये कुर्सी के खेल में  मगध के पहले राजा बिम्बिसार को, कैसे अपने ही बेटा अजातशत्रु के द्वारा कालकोठरी में बंद कर मौत की नींद सुला दिया गया था। औरंगजेब ने अपने ही पिता शाहजहां को कैसे निबटा दिया।

खैर इतिहास को जाने दीजिये, वर्तमान राजनीति में लाल टोपी वाले युवा नेता अखिलेश यादव को देखिये, कैसे अपने पिता गुरु व सब कुछ  समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव के चेहरे से राष्ट्रीय अध्यक्ष होने का कलफ ही नोच डाला था। अब तो मुलायम को अखिलेश ने पार्टी के स्टार प्रचारक की लिस्ट तक में नहीं हैं। लखनऊ के गेस्ट हाउस में मायावती को कैसा दर्द दिया था समाजवादी गुंडों ने कुछ दिन पहले तक बहनजी बिलबिलाती फिरती थी। लेकिन सियासत है साहब जहां संवेदनाएं कब की मर चुकी हैं। शाहनावाज़ साहब आपके बिहार भाजपा कार्यालय में कल गया था। दर्द पोर-पोर में दिखा ।

लेकिन धन्य है उसे भी लोग दबा कर बैठे हैं, बहुतेरे दबाए-दबाए चल बसे। सुनते है दर्द दबाने वाली राजनीति से भी बहुत कुछ हासिल किया जाता है, लेकिन आपने तो दर्द बयां कर दिया। लेकिन इसमें राजनीति मत कीजिये, साफ बोलिये न की घर के ही लोग शहनवाज़ हुसैन के जलाए दिए को बुझाने पर तुले हैं।  इतिहास गवाह है दर्द जितना दबाओगे मर्ज उतना ही बढ़ता जाएगा।

कौशलेंद्र प्रियदर्शी

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