जिस कोरोना से जान बचाने के लिए छोड़ा था शहर, अब दोबारा करने लगे वहीं का रुख

 जिस कोरोना से जान बचाने के लिए छोड़ा था शहर, अब दोबारा करने लगे वहीं का रुख

DESK: कोरोना वायरस महामारी की वजह से हुए लॉकडाउन मका सबसे बड़ा असर श्रमिकों पर पड़ा था. दिहाड़ी मजदूर काफी ज्यादा परेशान थे. कोरोना से बचने के लिए और पैसे की तंगी की वजह से  करोड़ों श्रमिक अपने गांव लौट गए थे. उनके पास जाने का कोई साधन नहीं था, तो वे पैदल ही चल पड़े थे. केंद्र एवं राज्य सरकारों ने उनके लिए गांव में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत काम-धंधे का जुगाड़ कर दिया. मार्च के बाद पहले चार महीनों में लगभग साढ़े पांच करोड़ परिवारों ने मनरेगा का फायदा उठाया. एक परिवार में से किसी न किसी सदस्य को कोई काम मिल गया.

लेकिन अब काम लेने वालों का आंकड़ा कम होने लगा है. जुलाई में मनरेगा के तहत 3.08 करोड़ परिवारों ने काम के लिए आवेदन दिया था, तो वहीं जून में यह संख्या 4.07 करोड़ थी. चालू माह की बात करें तो 15 तारीख तक 1.48 करोड़ लोगों ने ही रोजगार की मांग की है. बता दें कि लॉकडाउन-1 के बाद जून-जुलाई माह में मनरेगा के तहत रोजगार लेने वालों की संख्या में कमी देखी गई है. मार्च में जब कोरोना संक्रमण ने शहरी इलाकों में पांव पसारने शुरू किए, तो वहां से भारी संख्या में श्रमिकों ने अपने गांव लौटना शुरू कर दिया था.

सरकार की तरफ से दिहाड़ी मजदूरों को उनके राज्य में रोजगार देने की पहल की. पीएम मोदी ने गरीब कल्याण रोजगार योजना की शुरुआत की. पीएम मोदी का कहना था कि दिहाड़ी मजदूर काफी ज्यादा टैलेंटेड हैं. पीएम मोदी ने कहा था कि जो लोग शहरों को चमका सकते हैं तो गांव को क्युं नहीं. इसी कड़ी इस योजना की शुरुआत की गई थी, लेकिन वो नाकाफी है. अब एक बार फिर से रोजगार की समस्या को देखते हुए श्रमिक वापस शहरों का रुख कर रहे हैं

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