गुस्से में हैं लालू , कुंडली मारकर बैठे कई नेताओं पर गिरेगी गाज

गुस्से में हैं लालू , कुंडली मारकर बैठे कई नेताओं पर गिरेगी गाज

PATNA : राजद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बाद संगठन के बदलाव की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी। बताया जा रहा है कि चुनाव में मिली करारी हार से लालू प्रसाद काफी गुस्से में है। पांच जुलाई को आरजेडी का स्थापना दिवस है। उसके  अगले दिन राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक है। बैठक के बाद संगठन के वर्तमान स्वरूप को  को बदलने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बैठक में कई नेताओं पर गाज गिरने वाली है। 

इस बार बिना लालू के होगी राष्ट्रीय कार्यकारिणी 

राजद की स्थापना 5 जुलाई 1997 को  हुई थी।चारा घोटाला मामले में लालू प्रसाद जेल में सजा काट रहे हैं। लिहाजा इस बार राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक लालू प्रसाद के गैरमौजूदगी में हीं होगी।हालांकि कार्यकारिणी का एजेंडा क्या होगा यह अबतक क्लीयर नहीं है।

लोकसभा चुनाव में मिली हार से उबरनें की होगी कवायद

इस बार के लोकसभा चुनाव में राजद को मिली करारी हार के बाद पार्टी चारो खाने चित्त है।पार्टी को समझ में समझ में नहीं आ रहा कि आगे क्या किया जाए।लिहाजा राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी को हार के सदमे से उबारने की नई रणनीति बनेगी।

विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को कसने की कवायद

2020 में होने वाली बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राजद अपने संगठन को कसने की कोशिश करेगी।क्यों कि इस बार के लोकसभा चुनाव में संगठन में तालमेल का अभाव दिखा था।अगर बीच में कमेटि में बदलाव होता है तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले राजद अपने संगठन को मजबूत बनाना चाहती है।

सिर्फ राजद नहीं बल्कि परिवार में भी है बगावत

सिर्फ राजद के नेताओं के बीच आपसी तालमेल की कमी है है बल्कि पार्टी सुप्रीमो लालू परिवार के अंदर भी भारी विरोध है।यूं कहें कि लालू के दोनों लाल के बीच बगावत स्पष्ट तौर पर दिखती है।लोकसभा चुनाव में सीट बंटवारे को लेकर लालू के दोनों बेटों में मतभेद स्पष्ट तौर पर दिखे थे।इसका प्रभाव चुनाव पर भी देखने को मिला था। चुनावी में मिली करारी हार के बाद पार्टी का नेतृत्व कर रहे तेडस्वी यादव आज्ञात वास में चले गए।इससे भी इस बात को बल मिलता है कि लालू परिवार के भीतर सबकुछ टीक नहीं है।

ढ़ीले प्रदेश कमेटी को कसने की होगी कवायद

लोकसभा चुनाव के पहले प्रदेश अध्यक्ष डॉ. रामचंद्र पूर्वे ने पार्टी लाईन से इतर जाकर दर्जनों प्रदेश महासचिव नियुक्त कर दिए थे।नियुक्त करने के पीछे चाहे जो भी मजबूरी हो लेकिन उपरी तौर पर कहा गया कि चुनाव में इससे फायदा लेना। लेकिन रामचंद्र पूर्वे की इस कोशिश से कोई फायदा नहीं मिला। अब खबर है कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के बाद जब संगठन को कसा जाएगा तो उनमें से कईयों की छुट्टी होगी।

इस बार के लोकसभा चुनाव में बिहार के कई जिलों के जिलाध्यक्षों की भूमिका भी संदिग्ध रही। वैसे जिलाध्यक्षों पर पार्टी की नजर है।

विवेकानंद की रिपोर्ट

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