सामाजिक न्याय के मसीहा लालू का कुनबा, क्या पारिवारिक न्याय के अभाव में महाभारत पर उतर आया है? पढ़िए पूरी रपट....

सामाजिक न्याय के मसीहा लालू का कुनबा, क्या पारिवारिक न्याय के अभाव में महाभारत पर उतर आया है? पढ़िए पूरी रपट....

लालू के घर में महाभारत, जी हां महाभारत, यह शब्द हिंदुस्तान के ऐतिहासिक वजूद पर एक कलंक की तरह कुछ ऐसा चस्पा है जिसकी चर्चा करते हुए आज भी समाज सहम जाता है। लेकिन, इसका एक बड़ा ही सकारात्मक आध्यात्मिक पक्ष यह है कि उन कठिन परिस्थितियों में मौजूद भगवान कृष्ण के अस्तित्व ने युद्ध के मैदान से एक ऐसा दर्शन दिया जिसके दर्पण में जिसने भी एक बार मन से झांक लिया वो तमाम सांसारिक झंझटों से मुक्त हो गया। 

भगवान कृष्ण ने युद्ध के मैदान में गीता गढ़कर यह संदेश देने का काम किया कि इस दर्शन से दो-चार होने के बाद आने वाला समाज और सत्ता महाभारत जैसे दुहस्थितिओं के निर्माण से अपने आप को बचा सके। लेकिन विडम्बना देखिये की भगवान कृष्ण जैसे पूर्ण पुरुष के संदेश का असर न तो अहंकार में डूबे सत्तानाशीनों पर हुआ न ही स्वार्थ के सैलाब में गोते लगाता समाज पर। परिणामस्वरूप इतिहास के दीवार पर एक से बढ़कर एक हिंसक लड़ाइयों की इबारत का खाका स्वार्थ और अहंकार की स्याही से खींची जाती रही।

   कहा जा रहा है कि आज फिर एक महाभारत अपने अस्तित्व में आ चुका है, जिसकी चर्चा मीडिया से लेकर समाज खूब चटखारे ले ले कर कर रहा है।

अब इसे समझिये कि समाज जिसे सामाजिक न्याय के मसीहा की संज्ञा देते-देते थकता तक नहीं है उसका अपना घर पारिवारिक न्याय के अभाव में बिखरने के कगार पर आ चुका है। विडम्बना देखिये कि समाज को न्याय दिलाने का दम्भ भरने वाले लालू प्रसाद आज अपने ही घर में छिड़े महाभारत को देख विवश हैं, मौन हैं, लाचार हैं। तो क्या इसे मान लें कि सामाजिक न्याय का पुरोधा ढंग से पारिवारिक न्याय भी नहीं कर पाया? आखिर तेजप्रताप को विद्रोह के लिये कौन विवश कर रहा है।

 बहरहाल थोड़ा पृष्ठभूमि को समझिये। उस महाभरत की पृष्ठभूमि में पिता को सौ-सौ पुत्र हुआ करता था पर आज तो सामाजिक न्याय वाले पिता के पास सिर्फ 2 ही पुत्र हैं। उसके बाद भी विद्रोह से उपजा बवाल सवाल पे सवाल खड़ा कर रहा है।

 अरे भाई उस महाभारत में तो कृष्ण और अर्जुन के सामने दुर्योधन और दुःशासन थे। धृतराष्ट्र के सामने पुरु थे। लेकिन, यहां तो सिर्फ कृष्ण और अर्जुन ही शेष हैं। फिर महाभारत की नौबत क्यों?  क्या यह कलयुग का प्रभाव तो नहीं!

जरा रुकिये दिनकर की कुछ पंक्तियां मानस पटल को मथ रही हैं, जी हां वो कुछ ऐसी हैं

“कृष्ण दुर्योधन से कहते हैं कि महाभारत होने से रोक लो।

अनुग्रह करते हुए कहते है, 

दे दो केवल पांच ग्राम, 

रखो अपनी भूमि तमाम

दुर्योधन वह भी दे न सका, 

आशीष समाज का ले न सका”

जी बिल्कुल वहां सिर्फ पांच ग्राम  मांगा गया था, लेकिन दुर्योधन ने इनकार कर दिया। यहां तो सिर्फ 2 संसदीय क्षेत्र मांगा जा रहा है। पांडव अपनी पत्नी द्रौपदी को जुए में हार गए थे न्याय की गुहार पर कृष्ण ने करिश्मा कर दिखाया। परन्तु यहां तो कृष्ण खुद लाचार है या फिर लाचार कर दिया गया है।राजद का स्वयंभू कृष्ण न्याय की गुहार अपने माता-पिता से और विशेष तौर पर अर्जुन से लगाने को विवश हैं। वास्तव में कलयुग है मान लिया, जय श्री कृष्ण।

आगे बढ़िए, अब थोड़ा इसे भी समझ लीजिये। वर्तमान राजनीति वंशवाद की सियासत से आबाद है यह सबको पता है। यह भी सबको पता है कि बड़े ही गौरव से राजनेता पिता कुछ न कर पाने में सक्षम अपने लाडलों को बड़े ही बेशर्मी से अपना उत्तराधिकारी बना देते हैं। उन परिस्थितियों में जब उसी दल में एक से बढ़कर एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता मौजूद रहते हैं। ठीक है चलिये मान लिया कि यह नेताजी का  विशेषाधिकार है। लेकिन, सामाजिक न्याय के मसीहा को आखिर बड़े बेटे में क्या खोट नजर आई कि वे उसे स्वास्थ्य मंत्री होने के साथ-साथ 2 से तीन मंत्रालय और संभालने के लायक तो समझते हैं, लेकिन उपमुख्यमंत्री के लायक नहीं। पता नहीं राजनेता अपने परिवार को राजनीति का मोहरा क्यों बना देते हैं, सम्भवतः यही आज की राजनीति है।

यह बात राजद के कृष्ण को यानी तेज को भी समझना होगा कि क्या मुझमें कोई कमी है जो मेरे साथ इस तरह का व्यवहार किया जा रहा है। लेकिन इस राजनीति को भी समझिये कि तेजप्रताप को यह पता है उनके साथ जो हो रहा है उसके आधार में कौन है। लेकिन जनाब बड़ी सफाई से परिवार के कलह का ठीकरा दूसरे के माथे फोड़ रहे हैं। होना भी चाहिये एक बड़े भाई को छोटे का बचाव करना कर्तव्य है। लेकिन बड़ा सवाल यह है की क्या लालू राबड़ी को यह बात पता नहीं थी कि जो हम कर रहे हैं उसे मुझे ही भरना होगा। खैर यह लालू जी का न्याय क्षेत्र है। 

जरा सोचिए कि जिस दिन लालू प्रसाद के घर में बड़े बेटे को छोटे के सामने छोटा करने की कोशिश शुरू की गई थी, उसी दिन इस महाभारत का बीजारोपण लालू ने खुद कर दिया था। लेकिन, देखिये उस व्यवहार को तेजप्रताप ने बड़े ही सहजता से स्वीकार भी कर लिया। बात चल निकली। लेकिन जिस संस्कार की नींव रखी गई उसे और मजबूती देने की कोशिश लगातार होने लगी। यानी छोटे से घाव में मवाद भरने का काम खुद परिवार ही करने लगा। हुआ क्या, एक तरफ छोटे भाई तेजस्वी के नेतृत्व में राजद को रंग देने की कोशिश हो रही है तो दूसरी तरफ बड़े भाई तेजप्रताप स्वयं को लगातार उपेक्षित महसूस करने लगे। लेकिन लोकसभा चुनाव में अपनी उपेक्षा को तेज ने बर्दास्त करना मुनासिब नही समझा। फिर जो हुआ सबके सामने है।

दो सीटों की मांग के बाद जोर आजमाइश में असफल तेजप्रताप ने बाजाब्ता मोर्चा ही खोल दिया। बहरहाल घर मे चल रहे महाभारत पर तेजस्वी देश की दुहाई देकर बचने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। मतलब साफ है कि छोटे के द्वारा बड़े को लगातार छोटा दिखाने की कोशिश ने ही आज बड़ा रूप धारण कर लिया है। यानी पार्टी पर कब्जे की यह लड़ाई अगर नहीं रुकी तो महागठबंधन के पेट में महाक़ब्ज बनना तय है। जिसकी वजह से परिवार तो टूट ही रहा है पार्टी का भी प्रभावित होना तय है। तो कुल मिलाकर यह समझ लिया जाए कि तथाकथित समाजिक न्याय का मसीहा पारिवारिक न्याय करने में पूर्णत विफल रहा, परिणामस्वरूप दोनों बेटों के बीच तलवारें खिंच गई है.

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