आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत खुदाबख्श लाइब्रेरी में व्याख्यान, वक्ता बोले- स्वतंत्रता आंदोलन में गुमनाम नायकों की भूमिका अतुलनीय

आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत खुदाबख्श लाइब्रेरी में व्याख्यान, वक्ता बोले- स्वतंत्रता आंदोलन में गुमनाम नायकों की भूमिका अतुलनीय

पटना. खुदाबख्श लाइब्रेरी के तत्वावधान में आजादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत स्वतंत्रता संग्राम में बिहार के गुमनाम नायक विषय पर व्याख्यान का आयोजन किया गया। इस व्याख्यान में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के शोधप्रज्ञ मो. दानिश शामिल हुए। व्याख्यान के आरंभ में खुदाबख्श लाइब्रेरी की निदेशक शाइस्ता बेदार ने कहा कि आजादी की लड़ाई में समाज के हर हिस्से के लोगों ने भागीदारी की थीl विभिन्न धर्मों और पंथों के मानने वाले लोग आजादी की लड़ाई में देशसेवा और गुलामी से मुक्ति के उद्देश्य से एकजुट हुए थेl उनके बीच भेदभाव की हर दीवार राष्ट्रसेवा के लक्ष्य के सामने ढह गई थी। यही वजह है कि इस दौर में एक ऐसे समावेशी समाज का निर्माण हुआ जिसने धर्मनिरपेक्ष भारत की नींव रखी l इन सपूतों की जिंदगी का यही पैगाम था कि देश की सेवा और देश की तरक्की के लिए हर तरह के नफरत और दुश्मनी को खत्म किया जाए तभी सशक्त भारत सपना पूरा होगा। आज इस पैगाम को अमली जामा पहनाने की सख्त जरूरत है।

व्याख्यान के विषय पर बोलते हुए मुख्य वक्ता मो. दानिश ने कहा कि भारत की आजादी लाखों लोगों के बलिदान का प्रतिफल है। इस लड़ाई में किसान, मजदूर, विद्यार्थी से लेकर पढ़े लिखे तबके तक ने अपनी अहम कुर्बानियां दी थीं। इस लड़ाई में शामिल कुछेक लोगों को पहचान और शोहरत मिली तो कुछ लोग इतिहास की अंधेरी खाई में दब गएl इन लोगों के योगदान को लगभग भुला दिया गया, लेकिन इनका योगदान किसी से कम नहीं थाl


उन्होंने आगे कहा कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कई ऐसे समर्पित देशप्रेमियों ने नेतृत्वकारी भूमिकाएं अदा की हैं, जिन्हें आज हम लगभग भूल से गए हैं l ऐसे गुमनाम नायकों में पीर मुहम्मद मूनिस, गुलाब शेख और प्रोफेसर अब्दुलबारी का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता हैl पीर मुहम्मद मूनिस और गुलाब शेख चंपारण के किसान आंदोलन के, जिसे नीलहों के खिलाफ आंदोलन के नाम से भी जाना जाता है, सक्रिय सूत्रधार थे। शेख गुलाब ने चंपारण में पहली बार संगठित किसान आंदोलन को खड़ा किया और अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए l हिंदी और उर्दू भाषा के अध्येता पीर मुहम्मद मूनिस जहां अपनी कलम के जरिए चंपारण के किसानों की दुर्दशा को ‘चंपारण में अंधेर’ शीर्षक से ‘प्रताप’ अखबार में लगातार लिखकर उजागर कर रहे थे। वहीं शेख गुलाब ने किसानों की जमीनी गोलबंदी का ठोस धरातल तैयार किया, जिससे आगे चलकर व्यापक किसान आंदोलन की नींव पड़ी। इन दोनों विभूतियों के अथक प्रयासों से विकसित हुए साम्राज्यवाद विरोधी चेतना का ही परिणाम था कि महात्मा गांधी द्वारा चंपारण में किया गया जनसंघर्ष पूर्णतः सफल रहाl

प्रोफेसर अब्दुल बारी भारतीय मुक्ति संग्राम के उस पीढ़ी के नायक हैं, जिसका आदर्श निःस्वार्थ सेवा और त्याग हुआ करता था l मजदूरों के आंदोलन को संगठित रूप देने की दिशा में प्रोफेसर अब्दुलबारी का अहम योगदान है। टाटा में लेबर यूनियन की बुनियाद इन्हीं के अथक परिश्रम से संभव हुआ। श्रमिक अधिकारों के सशक्त पैरोकार शिक्षाविद प्रोफेसर अब्दुल बारी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख संगठनकर्ता भी थेl महात्मा गांधी ने प्रोफेसर अब्दुल बारी को ‘एक सच्चे फकीर का जीवन जीने वाला व्यक्ति’ के रूप में याद किया हैl चनपटिया के हाजी दीन मोहम्मद ने चंपारण के किसान आंदोलन को प्रचुर आर्थिक मदद पहुंचाई और गांधीजी के चंपारण आगमन के खर्च का भी भार उठाया। इनका घर क्रांतिकारियों की बैठकों का प्रमुख अड्डा था। इसी तरह शीतल राय और खेंहर राय ने किसानों के बीच जागरूकता फैलाकर आंदोलन की तैयारी में महती भुमिका निभाई। इन सभी क्रांतिकारियों को जेल की लंबी सजाएं हुईं। इनकी संपत्ति जब्त हुई। इनके परिजनों को भी सजाएं दीं गईं फिर भी ये अपने देश सेवा से नहीं हिचकेl महेंद्र प्रसाद रक्सौल के युवा क्रांतिकारी थे, जिन्होंने 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई और ब्रिटिश पुलिस की नींद हराम कर दी।

इस मौके पर प्रोफेसर इम्तियाज अहमद ने अपने संबोधन में स्वतंत्रता संग्राम में मजहारूल हक और जयप्रकाश नारायण की महत्वपूर्ण भूमिकाओं को याद किया। उन्होंने आजाद दस्ते की क्रांतिकारी भूमिका पर भी प्रकाश डाला। बिहार के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्होंने इसे क्रांति की जननी बताया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रोफेसर मुज्तबा साहब ने कहा कि आजादी के गुमनाम नायक ही हमारे सच्चे रोल मोडल हैं। इनको याद करना आज के समय की जरूरत है। इनके किए गए कार्यों के युवा पीढ़ी को प्रेरणा लेनी चाहिए और समरसता पूर्ण समाज को साकार करने का प्रयत्न करना चाहिए। बिहार ने बदलाव की लड़ाई को हमेशा नेतृत्व दिया है। आगे भी बिहार के युवा ही समाज परिवर्तन की जिम्मेदारी निर्णयात्मक तौर पर निभाएंगे।

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