लेखक फिल्म की दुनिया का खुदा होता है, बोले दिग्गज लेखक कमलेश पाण्डेय

लेखक फिल्म की दुनिया का खुदा होता है, बोले दिग्गज लेखक कमलेश पाण्डेय

PATNA : लेखक फिल्म का पहला स्टार होता है। उसके पहले कोरा कागज होता है। फिल्म सबसे पहले लेखक के दिमाग में बनती है। लेखक एक दुनिया की रचना करता है। उसके किरदारों के किस्मत का फैसला लेखक करता है। इसलिए एक तरह से कहें तो लेखक फिल्म की दुनिया का खुदा होता है। उक्त बातें सौदागर, दिल, रंग दे बसंती, जज़्बा जैसी प्रसिद्ध फिल्में लिखने वाले हिंदी सिनेमा के जानेमाने पटकथा लेखक कमलेश पांडेय ने कहीं। वे रविवार को पाटलिपुत्र सिने सोसायटी द्वारा आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। कमलेश पांडेय ने कहा कि सिनेमाघर में फिल्में देखना ग्रुप थेरेपी है। यह मोबाइल पर फिल्म देखने में संभव नहीं है। थियेटर इमोशनल जिम है। वहां भावों का कसरत होता है। दबी हुई भावनाएं का उदगार होता है। दबे हुए आवेग को निर्गत करने का माध्यम सिनेमा हॉल में बैठ कर सिनेमा देखना है। किसी के दु:ख में शामिल होना भी हमें आना चाहिए। यह दुखांत फिल्में मौका देती हैं। यह सुरक्षित मौका सिनेमाघर देता है। वहां से निकलने के बाद आप हल्के हो जाते हैं। दूसरी जगह यह संभव नहीं है। घर में भी नहीं।   

दिग्गज पटकथा लेखक ने उभरते हुए युवा लेखकों को बताया कि स्क्रीनरायर्ट एसोसिएशन, मुंबई भारत के फिल्म सिनेमा व टीवी के लेखकों के हक के लिए कार्य कर रहा है। हम लेखकों के अधिकार के लिए उच्चतम न्यायालय तक जाते हैं। सच है कि फिल्म उद्योग अभिनेताओं के हाथ में हॉस्टेज है। लेखकों का शोषण खत्म होगा। अब लेखकों को भी रॉयल्टी मिलती है। उसकी मृत्यु के 60 साल बाद तक यह मिलेगी। इसके लिए बात आगे बढ़ रही है। रॉयल्टी के अलावा मिनिमम बेसिक पेमेंट के लिए भी बात चल रही है। पांडेय ने कहा कि हम बॉलीवुड नहीं है। हमें नफरत है इस शब्दावली है। यह हमारे सिनेमा का अपमान है। बॉलीवुड एग्जिस्ट नहीं करता। हम भारतीय सिनेमा है। हमारा सिनेमा अलग है। यह यूरोपियनों व अमेरिकीयों को समझ नहीं आएगा, भले वे हमारे संगीत का आनंद लें। इसलिए हमें ऑस्कर नहीं मिलने वाला। किसी और से उधार न लें, अपनी जड़ों से सीखिए। नकल मत कीजिए। उनकी फिल्मों को एंजॉय कीजिए, लेकिन बनाइए अपना वाला सिनेमा। हम भरतमुनि की संतान हैं। हमारा वजूद उन्हीं से है। हमारे पास उपनिषद है, महाभारत हैं, पंचतंत्र है। ये कहानियों के भंडार हैं। 

वर्तमान समय में फिल्मों में अच्छी कहानियों के अभाव पर पांडेय ने कहा कि सिनेमा व साहित्य के बीच एक ट्रैफिक बने, ताकि सिनेमा को अच्छी कहानियां मिलें और साहित्यकारों को उनका ड्यू मिले। इससे दोबारा सिनेमा का स्वर्णकाल आएगा। इस विधा का लेखन थोड़ा सीखना पड़ेगा। लेकिन, यह कठिन नहीं है। जिनके पास कहानियां हैं, उन्हें अवसर मिले। आज भी अच्छी कहानियों की मांग है। उन्होंने कहा की 1955—65 हिंदी फिल्मों का स्वर्णकाल है, उस समय के फिल्मकार लेखकों के साथ वक्त बिताते थे। गुरुदत्त—अबरार अल्वी, राजकपूर—ख्वाजा अहमद अब्बास, बिमल रॉय— नवेंदु घोष, महबूब खान— वजाहत मिर्जा जैसे निर्देशकों व लेखकों की जोड़ियां थीं। फिर अस्सी का दशक भी आया जब जिसको कोई काम नहीं मिला, वो लेखक बन जाता था। इसीलिए 70—80 के दशक में खराब फिल्में बनीं। उस वक्त लेखन प्रशिक्षण की कोई व्यवस्था भारत में नहीं थी। 80 के दशक में फिल्म लेखक की दुर्दशा थी। प्रसिद्ध एक्टर तीन टेप लेकर आता था। किसी टेप का आरंभ, किसी का मध्य व किसी टेप का अंत लेकर फिल्म के लिए कहानी तैयार हो जाती थी। शेड्यूल के हिसाब से डायलॉग लिखे जाते थे। उस समय कोई व्यवस्थित लेखन नहीं था। मुझे आश्चर्य हुआ। मैं काम करते—करते लिखना सीखा। मुझे सिखाने में डायरेक्टर की अहम भूमिका रही। 80 के दशक में ही एफटीआईआई आया। उस समय हिंदी सिनेमा बुरे दौर में था। पांडेय ने कहा कि अंग्रेजी में पटकथा लेखन पर पुस्तकें हैं। जिन्हें फिल्मों में लिखने का काम नहीं मिलता, वे पटकथा लेखन के शिक्षक बन जाते हैं। वहां हर विवि में पटकथा लेखन के पाठ्यक्रम हैं। हर साल 8000 नए पटकथा लेखक निकलते हैं। इसलिए वहां अच्छी प्रतिस्पर्धा है। सैटेलाईट ने भारत के दर्शकों के लिए नए द्वार खोल दिए। टीवी ने सबको बाजार बना दिया। दर्शक की ओर गुणवत्ता की मांग शुरू हुई। सिड फिल्ड 2007 में मुंबई आए थे। उनको भरतमुनि का किस्सा सुनाया। दादी—नानी की कहानियों के बारे में बताया, तो उनको आश्चर्य हुआ। कहानी कहने की हमारी अपनी कला है। हम थ्री एक्ट के भरोसे नहीं हैं। हम उसके विरोधी भी नहीं है। हमारा लोकनाट्य से नाता है। वहीं से हमें प्रेरणा मिलती है। कहानी किसकी व कहां की है और वह क्या चाहता है। उसके किरदार कैसे हासिल करता है, यह कहानी का प्लॉट हुआ। किरदार को क्या कीमत चुकानी पड़ेगी? यह महत्वपूर्ण है। पटकथा का एक खास प्रारूप होता है। यह कहानी का विस्तार है। पूरी फिल्म जब कागज पर आ जाए, तो यही पटकथा है। यहां खामोशी को भी लिखा जाता है। अनसेड चीजों को सबटेक्स्ट में लिखा जाता है। सिनॉप्सिस 1—2 पेज, कहानी 30—40 पेज और पटकथा 80 से 120 पेज के आसपास हो सकता है।   

उन्होंने कहा की टीवी के लेखक अच्छा पैसा बना रहे हैं आजकल। भारत में अभिनेताओं के लिए साढे तीन भाव होने चाहिए— क्रोध, प्रेम, दुख और आधा भाव हास्य का। यह पूछे जाने पर कि युवा लेखन के बजाय अभिनय आदि में क्यों अधिक दिलचरूवपी लेते हैं, कमलेश पांडेय ने कहा कि मनोवैज्ञानिक बाधा है कि लोग दिखना चाहते हैं, लिखना नहीं चाहते। आजकल लड़कियां अच्छी फिल्में लिख रही हैं। अगर फिल्म उद्योग की ग्रुप फोटो लिया जाए, तो लेखक कहीं कोने में खड़ा होगा। एक फिल्म में अभिनय करके लोग सेलेब्रेटी बन जाते   हैं। फिल्म उद्योग में लेखकों को उचित श्रेय नहीं मिलने पर पांडेय ने कहा कि लेखक की मजबूरी है वह उन्हीं के साथ काम करता है, जो उनका शोषण करते हैं। आजकल डायरेक्टर लेखक की हकमारी कर रहा है। कमलेश पांडेय ने मशहूर फिल्मकार हिचकॉक की चर्चा करते हुए बताया कि हिचकॉक ने कहा था कि सिनेमा इज नॉट ए स्लाइस ऑफ़ लाइफ, इट्स ए पीस ऑफ़ केक। सिर्फ आपको असलियत देखना है, तो उसके लिए 300 रुपए खर्च करके सिनेमाहॉल क्यों जाना? वह आपके आसपास ही है। वहीं पर देख लीजिए। मेलोड्रामा क्यों? एसडी बर्मन ने कहा— वही से जहां से कैमरा आता है। सिनेमा एक डेरिवेटिव आर्ट है। हकीकत से चीजों को उठा लेना व उसको खुद में समाहित कर लेना। यह सिनेमा की खासियत है। हमारे जीवन में कहानी क्यों चाहिए? इस सवाल पर कमलेश पांडेय ने कहा कि जिंदगी अनफेयर व अनप्रिडेक्टिवल है। अच्छा आदमी हार जाता है। फिर जीना क्यों? यहीं पर सिनेमा का रोल अहम हो जाता है। वहां हीरो (अच्छा आदमी) की जीत अंत में होता है। सिनेमा में इंसाफ होता है। यह जीवन जीने के लिए आशा व उम्मीद देता है। फिल्म में कार्य व कारण दिखाता है। एक तार्किक संबंध है। यह जीवन में दिखायी नहीं पड़ता है।

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