प्रेमचंद को बनायें साहित्य की आलोचना दृष्टि का आधार : गजेन्द्र शर्मा

प्रेमचंद को बनायें साहित्य की आलोचना दृष्टि का आधार : गजेन्द्र शर्मा

ARWAL : अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ की जिला इकाई अरवल द्वारा 31 जुलाई को महान कथाकार प्रेमचंद की 142 वीं जयंती के मौके पर सर गणेश उच्च माध्यमिक विद्यालय, जयपुर, अरवल के परिसर में '‛प्रेमचंद और हमारा समय'’ विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस आयोजन की अध्यक्षता भीखर रविदास और संचालन कुंदन कुमार ने किया। बतौर मुख्य वक्ता शिवदेनी शाह महाविद्यालय, कलेर के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉo राम उदय कुमार ने कहा कि प्रेमचंद के लिए यथार्थ से अधिक जीवन का महत्व है। उनकी रचना के केंद्र में जीवन की आलोचना है। उन्होंने कहा की प्रेमचंद और गाँधी दोनों समाज के सबसे पददलित वर्ग के बारे में सोचते हैं। हमारे समय का सबसे बड़ा खतरा है अपनों के पराये हो जाने का।


प्रगतिशील लेखक संघ के राज्य कार्यकारिणी सदस्य सह अरवल जिला सचिव गजेन्द्र कान्त शर्मा ने कहा कि यदि हम आधुनिक समाज बनाना चाहते हैं तो हमें प्रेमचंद को अपनी आलोचना दृष्टि का आधार बनाना होगा। प्रेमचंद ने सत्ता और हर तरह के संस्थानों की सुसंगत आलोचना विकसित की थी। प्रेमचंद का लेखन पूंजीवाद से लड़ने का रास्ता सुझाता है। उनकी सबसे बड़ी देन है कि हम लेखन में एक साथ उनके समय की बहुअर्थी ध्वनियों को सुन सकते हैं। वे जितनी गहराई में उतरकर जमींदारों, पूंजीपतियों और उनके कारिंदों की ध्वनियों को पकड़ते हैं, उतनी ही गहराई में उतरकर किसानों-मजदूरों, दलितों, स्त्रियों की आवाज को भी पकड़ते हैं। वे किसी एक विचारधारा या किसी एक वर्ग या किसी एक पसंदीदा वर्ग का चित्रण नहीं करते। इसलिए उन्हें वे भी पढ़ते हैं जिन्हें राजनीतिक अर्थशास्त्र की समझ नहीं होती और वे भी पढ़ते हैं जो पूंजीवाद के हर चाल-चरित्र से अवगत होते हैं। पूंजीवाद और साम्प्रदायिकता से घिरे समय में प्रेमचंद हमारे  लिए बेहद जरूरी हैं क्योंकि उनका लेखन धर्मनिरपेक्ष आलोचना दृष्टि विकसित करता है। 

दाउदनगर महाविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक डॉo आकाश कुमार ने कहा कि सत्ता के शीर्ष पर जो हुक्मरान बैठे हैं, वे प्रेमचन्द के विचारों के खिलाफ हैं। जनता के प्रति सत्ता का रवैया बहुत बुरा है। देश की जनता को आज सम्प्रदायिकता की अफीम चटाई जा रही है। मौजूदा सत्ता राम-रहीम की एकता नहीं चाहती। दाउदनगर महाविद्यालय में उर्दू के प्राध्यापक डॉo हादी सरमादी ने कहा कि प्रेमचंद हिंदी-उर्दू के साझा लेखक हैं। उनके समय से हमारे समय की हालत अधिक खराब है। प्रेमचंद सामाजिक परिवर्तन का लक्ष्य लेकर लेखन कर रहे थे। इसलिए हमारे समय में भी उनकी जरूरत है।

प्रलेस के राज्य कार्यसमिति सदस्य राजकुमार शाही ने कहा कि प्रेमचंद ने साहित्य की भावभूमि को दरबारों से खेत खलिहानों में ले जाने का काम किया। वे आम अवाम के लेखक थे। मोइन अंसारी ने कहा कि अंग्रेजी हुकूमत के शोषण के विरुद्ध प्रेमचंद ने सोजे वतन लिखा। उनका समूचा लेखन ब्रिटिश हुकूमत के ख़िलाफ़ है। दाउदनगर प्रलेस के चंदन चांसी ने कहा कि भारत की युवा पीढ़ी को प्रेमचंद का साहित्य ही बचा सकता है। पूर्व मुखिया मनोज ने कहा प्रेमचंद का जीवन साधारण और लेखन असाधारण रहा। रामचंद्र पाठक ने कहा कि प्रेमचंद के समय के यथार्थ से हमारे समय का यथार्थ अधिक जटिल हुआ है। इसलिए हमें बहुत सचेत होने की जरूरत है। कवि संजय मिश्रा ने कहा प्रेमचंद उच्च कोटि के साहित्यकार हैं। पूर्व छात्र नेता अरुण पासवान ने कहा कि प्रेमचंद ने तत्कालीन समय की शिक्षा व्यवस्था पर भारी व्यंग्य किया है।

इस मौके पर राजकुमार शाही का निबंध संग्रह ‛उम्मीद अब भी जिंदा’ का लोकार्पण हुआ। इस परिचर्चा में डॉo बशिष्ठ कुमार, संजय कुमार, वेंकटेश शर्मा, अर्चना कुमारी, राम सागर मांझी, राकेश कुमार, चितरंजन कुमार, मोo अली अंसारी, भगवती पाठक, अखिलेश कुमार, आदित्य कुमार, रामेश्वर कुमार, कौशलेश कुमार के अतिरिक्त भारी संख्या में लेखक, अध्यापक, सामाजिक कार्यकर्ता, अधिवक्ता, पत्रकार आदि शामिल थे।

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