मुहर्रम जो इस्लाम में चार सबसे पवित्र महीनों में से एक होकर भी है मातम का महीना, जानिए ताजिया निकलने का कारण

मुहर्रम जो इस्लाम में चार सबसे पवित्र महीनों में से एक होकर भी है मातम का महीना, जानिए ताजिया निकलने का कारण

DESK. इस्लाम धर्म के अनुसार, मुहर्रम साल का पहला महीना होता है। इसे आम भाषा में हिजरी भी कहा जाता है। हिजरी सन की शुरूआत खासतौर पर इसी महीने से होती है। यह इस्लाम में चार सबसे पवित्र महीनों में से एक है। इस साल मुहर्रम या नया इस्लामी साल 30 जुलाई से शुरू हो रहा है। 'मुहर्रम' का शाब्दिक अर्थ 'निषिद्ध' है। इस्लाम धर्म के अनुसार, मुहर्रम के महीने को शोक या मातम का महीना कहा जाता है। 

ऐसा माना जाता है कि पैगंबर मुहम्मद ने इस महीने को "अल्लाह का पवित्र महीना" बताया था। इस महीने की 10 तारीख को पैगंबर मुहम्मद के पोते, इमाम हुसैन की शहादत हुई थी, जिसके चलते इस दिन को रोज-ए-आशुरा कहते हैं। इस दिन को मुहर्रम के महीने का सबसे अहम दिन माना जाता है। इस बार मुहर्रम 19 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन ताजिया निकाले जाते हैं और उन्हें कर्बला में दफन किया जाता है।

कर्बला की लड़ाई मुहर्रम के महीने में हुई महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है। कहा जाता है कि इराक में यजीद नामक जालिम बादशाह था जो इंसानियत का दुश्मन था। उससे निजात पाने के लिए हजरत इमाम हुसैन ने बडशाह यजीद के खिलाफ हिम्मत करके जंग का ऐलान कर दिया था। मोहम्मद-ए-मस्तफा के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला में परिवार व दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। यजीद के खिलाफ लड़ते-लड़ते और इंसानियत के लिए हुसैन और उनका परिवार शहीद हो गया। जिस महीने में हुसैन और उनके परिवार के लोग शहीद हुए वह महीना मुहर्रम का ही था। जिस दिन हुसैन का परिवार शहीद हुआ उस दिन मुहर्रम के महीने की 10 तारीख थी। जिसके बाद इस्‍लाम धर्म के लोगों ने इस्लामी कैलेंडर का नया साल मनाना छोड़ दिया। बाद में मुहर्रम का महीना गम और दुख के महीने में बदल गया।गया।

मुहर्रम का महीना शुरू होते ही मजलिसों (शोक सभाओं) का सिलसिला शुरू हो जाता है। इमामबाड़े सजाए जाते हैं। मुहर्रम के दिन जगह-जगह पानी के प्याऊ और शर्बत की छबीलें लगाई जाती हैं। हिंदुस्तान में ताज़िये के जुलूस में शिया मुसलमानों के अलावा दूसरे मज़हबों के लोग भी शामिल होते हैं। मुहर्रम की 9 तारीख़ को की जाने वाली इबादत का भी बहुत सवाब बताया गया है। सहाबी इब्ने अब्बास के मुताबिक़ हज़रत मुहम्मद (सल्ल।) ने फ़रमाया कि जिसने मुहर्रम की 9 तारीख़ का रोज़ा रखा, उसके दो साल के गुनाह माफ़ हो जाते हैं और मुहर्रम के एक रोज़े का सवाब 30 रोज़ों के बराबर मिलता है। इस्लाम धर्म के अनुसार, मुहर्रम हमें सच्चाई, नेकी और ईमानदारी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा देता है।


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