एनडीए ने 'भूमिहारों' को दिखाया ठेंगा, मोहभंग हुआ तो बीजेपी को लगेगा बड़ा झटका

एनडीए ने 'भूमिहारों' को दिखाया ठेंगा, मोहभंग हुआ तो बीजेपी को लगेगा बड़ा झटका

PATNA : एनडीए की तरफ से उम्मीदवारों का एलान होने के साथ ही यह तय हो गया है कि बीजेपी और उसके सहयोगी दलों ने उनका आधार वोट बैंक समझे जाने वाले 'भूमिहार' जाति को हाशिये पर ला खड़ा किया है। बीजेपी ने अपनी 17 सीटों में से केवल एक सीट बेगूसराय से 'भूमिहार' जाति से आने वाले केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को उम्मीदवार बनाया है। 

कुछ ऐसा ही हाल जेडीयू में भी 'भूमिहार' जाति के साथ हुआ है। जेडीयू के 17 उम्मीदवारों में से मंत्री ललन सिंह मुंगेर से इकलौते ऐसे उम्मीदवार हैं जो 'भूमिहार' जाति से आते हैं। इसी तरह एलजेपी ने भी अपने कोटे की 6 सीटों में 'भूमिहार' जाति से आने वाले एक उम्मीदवार को नवादा से टिकट दिया है। राजनीति में अनुभव नहीं होने के बावजूद एलजेपी ने सूरजभान सिंह के भाई चंदन सिंह को नवादा से उम्मीदवार बनाया है। हालांकि खगड़िया से एलजेपी को अभी उम्मीदवार के नाम का एलान करना है। 

बिहार की सियासत के जानकार यह मानते हैं 'भूमिहार' जाति बीजेपी और उसके गठबंधन का मजबूत वोट बैंक रहा है लेकिन इस जाति को 39 में से केवल 3 सीटों पर हिस्सेदारी मिलना खुद इस तबके के लिए किसी झटके से कम नहीं। हैरत की बात यह है कि एनडीए ने 'राजपूत' जाति से आने वाले 7 उम्मीदवारों और 'यादव' जाति के 5 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। 'भूमिहार' जाति के लिए एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि 39 में से जिन 3 उम्मीदवारों को एनडीए ने टिकट दिया है उनमें गिरिराज सिंह को पीएम मोदी का कट्टर समर्थक होने के कारण, ललन सिंह को सीएम नीतीश कुमार का बेहद करीबी होने और सूरजभान सिंह अपने भाई चंदन सिंह को एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान के खासम-खास होने के कारण टिकट हासिल कर पाए हैं।
उम्मीदवारी में हिस्सेदारी नहीं मिलने के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या 'भूमिहार' जाति अपनी उपेक्षा से नाराज़ होकर बीजेपी का साथ छोड़ देगी? क्या चुनाव में एनडीए को इस बात का खामियाजा उठाना पड़ेगा कि उसने अपने समर्थक वोट बैंक को नजरअंदाज किया? क्या हाशिये पर लाये जाने के बावजूद 'भूमिहार' मतदाता कमल का साथ नहीं छोड़ेंगे? जाहिर है इन सवालों का जवाब चुनाव नतीजों के साथ मिलेगा लेकिन अगर ऐसा हुआ तो बीजेपी के बिहार में यह किसी बड़े झटके की तरह होगा। उपेक्षा का असंतोष उभरा तो बीजेपी को अपना सबसे पुराना वोट बैंक खोना पड़ सकता है।

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