नीतीश सरकार ने कानून का उड़ाया माखौल...आयोग की गरिमा से किया खिलवाड़, बिहार BJP का CM पर प्रहार

नीतीश सरकार ने कानून का उड़ाया माखौल...आयोग की गरिमा से किया खिलवाड़, बिहार BJP का CM पर प्रहार

पटना. बिहार बीजेपी ने नीतीश सरकार पर कानून का माखौल उड़ाने का आरोप लगाया है। इसको लेकर भाजपा प्रवक्ता अरविन्द कुमार ने कहा कि नीतीश सरकार ने राज्य की गरिमा के साथ खिलवाड़ करने का कार्य किया है। सत्ता के मद में चूर मुख्यमंत्री ने अपने पद की गरिमा के प्रतिकूल, प्रभाव में लेकर चुनाव आयोग से चुनाव की अधिसूचना जारी करवा दी। उन्होंने कहा कि महाधिवक्ता एवं चुनाव आयोग का परामर्श था कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में डेडिकेटेड आयोग का गठन कर चुनाव के पूर्व आयोग का अनुशंसा प्राप्त कर चुनाव की तारीखों की घोषणा करना न्याय संगत होगा, पर सरकार द्वारा चुनाव कराने की अनुशंसा कानून का उल्लंघन है। 

उन्होंने कहा कि पटना उच्च न्यायालय द्वारा चुनाव स्थगन का आदेश पारित करने के पश्चात भी सरकार टाल-मटोल करती रही और बिना सोचे-समझे उच्च न्यायालय में पुर्नविचार याचिका दायर कर दी और पुनः उसे वापस ले लिया, जो खुद हास्यास्पद है। राज्य सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या बिहार सरकार के पटना उच्च न्यायालय में नियुक्त राजकीय अधिवक्ताओं पर विश्वास नहीं था, जो राजकीय कोष से सर्वोच्च न्यायालय के वकील को बुलाकर बहस करायी गयी और वो भी केवल याचिका वापस लेने के लिए यह पटना उच्च न्यायालय के कार्यरत सरकारी अधिवक्ताओं का अपमान है। साथ ही जनता के पैसे का दुरूपयोग है।

उन्होंने कहा कि जब न्यायालय से संचिका वापस लेनी थी और आयोग हेतु अधिसूचना जारी करनी थी तो फिर इस प्रकार का नाकारात्मक रवैया क्यों? सरकार को स्पष्ट करनी चाहिए कि सरकारी खजाने की राशि के दुरूपयोग हेतु कौन जवाबदेह है। उच्चतम न्यायालय के आदेश के बावजूद चुनाव की घोषणा, उसके प्रबंधन हेतु किये गये खर्चे के साथ-साथ प्रत्याशियों द्वारा किये गये सैकड़ों करोड़ रुपये खर्चे का जिम्मेदार राज्य सरकार है, क्या राज्य सरकार प्रत्याशियों के खर्चे का भरपायी करेगी।

उन्होंने कहा कि नीतीश सरकार क्या बता पाएगी कि उच्चतम न्यायालय के वरीय अधिवक्ता विकास सिंह एवं मनिन्दर सिंह क्या महाधिवक्ता एवं विधि विभाग के अनुशंसा पर बिहार सरकार का पक्ष रखने को उपस्थित हुए। मुख्य न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश में यह वर्णित है कि आनंद किशोर, प्रधान सचिव नगर विकास एवं आवास विभाग के आदेश पर केस में बहस हेतु हाजिर हुए तो क्या बिना विधि विभाग या महाधिवक्ता के आदेश के बिना किसी अन्यत्र के वकील को राज्य सरकार की ओर से वकील के रूप में सम्मिलित किया जा सकता है। क्या बिहार सरकार द्वारा नियुक्त किये गये राजकीय अधिवक्ता में से कोई संचिका वापस लेने के लिए भी सक्षम नहीं है?

उन्होंने कहा कि 2006 में गठित अत्यन्त पिछड़ा वर्ग आयोग को ही डेडिकेटेट आयोग का मात्र दर्जा दे देना और पार्टी के पदाधिकारियों को अध्यक्ष एवं सदस्य बना देना आयोग के गठन की विश्वसनियता पर प्रश्न चिन्ह उत्पन्न करती है। बिहार सरकार के पटना उच्च न्यायालय में नियुक्त राजकीय अधिवक्ता को दरकिनार कर सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता विकास सिंह, मनिन्दर सिंह एवं इसी प्रकार राज्य चुनाव आयोग की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वरीय अधिवक्ता दिनेश द्विवेदी को उच्चतम फीस का भुगतान करना, राज्य सरकार द्वारा जनता के टैक्स के पैसे का दुरूपयोग है एवं पटना उच्च न्यायालय में नियुक्त सरकारी वकीलों की मानहानी है।

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