नीतीश के तीर ने तेजस्वी-लालू का कलेजा दिया चीर, बहुत बड़ा संदेश दे दिया, क्या अब फिर लेंगे सियासी करवट... !

नीतीश के तीर ने तेजस्वी-लालू का कलेजा दिया चीर, बहुत बड़ा संदेश दे दिया, क्या अब फिर लेंगे सियासी करवट... !

पटना. बिहार की राजनीति में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जदयू का निशान तीर है. वहीं नीतीश के तरकश में ऐसे ऐसे तीर हैं जिससे उनके विरोधी भी घायल होते हैं और साथ वाले भी भेद दिए जाते हैं. दरअसल, ये ऐसे तीर हैं जिसके सहारे नीतीश कुमार बिहार की गद्दी पर वर्ष 2005 से करीब करीब बैठे हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कभी भाजपा और कभी राजद-कांग्रेस-वाम दलों से गठबंधन करना पड़े. नीतीश की खासियत है कि वे गठबंधन में जिसके साथ रहे बोलते हैं अपने मन की. यहां तक कि सहयोगी दल की विचारधारा के उलट भी बोलना पड़े तो वे उससे भी नहीं चूकते. 

ऐसा ही देखने को मिला अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती पर जब नीतीश कुमार दिल खोलकर अटल बिहारी की तारीफ की. उन्होंने इसकी भी परवाह नहीं की अटल की तारीफ से उनके सहयोगी दल राजद और कांग्रेस या वाम दलों को यह खटक ना जाए. वहीं अटल की तारीफ करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आइना दिखाने से नहीं चूके कि गठबंधन धर्म निभाने के लिए अटल बिहारी से सीखना चाहिए. दरअसल, अटल बिहारी वाजपेयी और नीतीश कुमार का लम्बा राजनीतिक साथ रहा. वर्ष 1995 से ही दोनों साथ हुए. वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में बिहार में अटल बिहारी वाजपेयी का नाम लेकर नीतीश कुमार ने अपने लिए वोट मांगा. फिर 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमन्त्री बने तब नीतीश कुमार भी उनके मंत्रिमंडल में शामिल हो गए. 

वर्ष 2005 में जब बिहार में एनडीए को बहुमत आया तो अटल बिहारी वाजपेयी ने नीतीश को बिहार का सीएम बनाने की पहल की. वहीं इसी दौर में अटल बिहारी वाजपेयी ने बिहार में लालू यादव और उनके सहयोगियों पर राजनीतिक हमला करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ा. इसे लेकर अटल बिहारी हमेशा ही लालू यादव के निशाने पर रहे. विशेषकर उनकी हिन्दुत्ववादी छवि पर लालू कई बार निशाने साधे. ऐसे में एनडीए से अलग होकर भी नीतीश कुमार का एक बार फिर से अटल बिहारी की तारीफ करने से लालू और उनके बेटे तेजस्वी यादव का कलेजा चीरने जैसा बयान रहा. 

नीतीश के बयान को देखें तो उन्होंने साफ कर दिया कि भाजपा में अटल राज था तब वहां सहयोगियों का सम्मान था. वहीं पीएम मोदी के दौर में सब कुछ बदल गया है. उन्होंने बिना नाम लिए ही साफ कर दिया कि अटल बिहार वाजपेयी के दौर में जिस प्रकार का एनडीए में दौर था वह अब नहीं रह गया. नीतीश ने अपने बयान से एक साथ जहाँ लालू-तेजस्वी को भी भेदा तो दूसरी ओर भाजपा के नेताओं को भी संदेश दिया कि उनका एनडीए से अलग होने का निर्णय जरुर रहा लेकिन आज भी वे अटल बिहारी का सम्मान करते हैं. 

नीतीश अपने इन्हीं बयानों के कारण हमेशा ही एक ऐसी राह बनाए रखते हैं जिसमें प्रतिद्वंद्वी से वार्त्ता करने का एक मौका दिए रहते हैं. यही कारण है कि नीतीश कुमार ने जब 2013 में एनडीए से अलग होने का निर्णय लिया तब भी विपक्षी दलों ने उनकी प्रशंसा की. वहीं जब 2017 में फिर से महागठबंधन से अलग होकर भाजपा से हाथ मिलाया तो वहां भी उन्हें मजबूत साथ मिला. अब फिर से जब अगस्त 2022 में नीतीश ने महागठबंधन से नाता जोड़ा तो उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई. ऐसे में अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती के बहाने उनकी तारीफ नीतीश के तरकश के उसी तीर की निशानी है जिसमें वे लालू-तेजस्वी को घायल भी कर गए और भाजपा भी भेद गए. 


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