नीतीश की जदयू का आरोप- संसद व संविधान की नहीं, बल्कि आर्डिनेंस और तानाशाह की है मोदी सरकार

नीतीश की जदयू का आरोप- संसद व संविधान की नहीं, बल्कि आर्डिनेंस और तानाशाह की है मोदी सरकार

पटना. जदयू ने केंद्र की मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाया है. मोदी सरकार को संसद व संविधान की नहीं, बल्कि आर्डिनेंस और तानाशाह की सरकार कहा है. प्रदेश जदयू कार्यालय में जदयू के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक झा एवं अंजुम आरा ने आरोप लगाया कि जब से केंद्र में मोदी सरकार आई है, तब से संसद का सत्र लगातार कम हो रहा है, साथ ही मोदी सरकार ने संसद में बिल पास करवाने के बजाय देश को अध्यादेशों के बल पर तानाशाही रूप से चला रही है।

जदयू प्रवक्ताओं ने कहा कि सरकार ने हास्यास्पद कारण देते हुए इस वर्ष का शीतकालीन सत्र तय तिथि 29 दिसंबर से 7 दिन पहले ही 23 दिसंबर को खत्म कर दिया । सरकार का मानना है कि चुकी क्रिसमस और नया वर्ष आने वाला है, इसलिए संसद का सत्र पहले खत्म कर दिया गया है। जदयू प्रवक्ताओं ने भाजपा को 2011 के शीतकालीन सत्र की याद दिलाते हुए बताया कि उस वर्ष संसद का शीतकालीन सत्र 29 दिसंबर तक चला था, हालांकि सत्र समय पूरा होने की तिथि 23 दिसंबर ही थी, लेकिन तत्कालीन सरकार ने सत्र की अवधि 8 दिनों तक बढ़ा दी थी।  

यह कोई पहला मौका नहीं है जब मोदी सरकार द्वारा संसद का सत्र तय समय से पहले खत्म कर दिया गया हो। कोविड काल के बाद से आज तक संसद का एक भी सत्र अपना तय समय पूरा नहीं कर पाई है। जो संसद वर्ष 2011 के बजट सेशन के दौरान 50 दिनों तक चला था, वही संसद वर्ष 2022 के बजट सेशन के दौरान मात्र 24 दिनों तक चला है।  वर्ष 2022 में संसद मात्र 75 दिन चला, जबकि वर्ष 2011 में यह कुल 110 दिनों तक चला था। 

जदयू प्रवक्ताओं ने कहा कि एक तरफ संसद में पेश होने वाले बिलों (विधेयक) की संख्या में लगातार कमी हो रही है और दूसरी तरफ सरकार द्वारा गैर-संसदीय ढंग से आर्डिनेंस (अध्यादेशों) की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जहां वर्ष 2022 में सरकार ने महज 29 विधेयक संसद मं1 पेश किया था, वहीं वर्ष 2011 में कुल 58 विधेयक पेश किये गए थे। दूसरी तरफ वर्ष 2014 से लेकर 2021 के दौरान 7 वर्षों में ही मोदी सरकार 84 अध्यादेश जारी कर चुकी थी, जबकि UPA सरकार ने अपने दस वर्षों के कार्यकाल के दौरान मात्र 61 अध्यादेश ही जारी किया था।   

प्रवक्ताओं ने कहा कि एक अध्यादेश और विधेयक में मूल अंतर यह होता है कि विधेयक संसद में संवैधानिक रूप से बहस करके, और मतदान होकर कानून का रूप लेती है, जबकि अध्यादेश के ऊपर न कोई बहस होती है और न ही मतदान होता है। जब संसद नहीं चल रहा होता है, तब सरकार बिना किसी से पूछे, बिना किसी से चर्चा किये, बिना किसी से सुझाव लिए अध्यादेश के रूप में तुगलकी फरमान जारी करती है। अर्थात यह सरकार संसद और संविधान की नहीं, बल्कि आर्डिनेंस और तानाशाह की है। लेकिन भाजपा को भूलना नहीं चाहिए कि तीन काले कृषि कानून को भी सरकार ने अध्यादेश के द्वारा ही लागू करने की कोशिश की थी, लेकिन देश के किसानों के इस गैर-संवैधानिक मंसूबों को धूल चटा दिया था।


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