नियोजित शिक्षकों को हक दिलाने के बहाने बड़े वोट बैंक पर नेताओं की नजर, वोटरो को लुभाने के लिए अपनाये जा रहे हर हथकंडे

नियोजित शिक्षकों को हक दिलाने के बहाने बड़े वोट बैंक पर नेताओं की नजर, वोटरो को लुभाने के लिए अपनाये जा रहे हर हथकंडे

PATNA: बिहार चुनाव में इस बार तेजस्वी यादव नियोजित शिक्षकों के इश्यू को भरपूर भुनाने की कोशिश कर रहे हैं. तेजस्वी ने ऐलान कर दिया है कि अगर महागठबंधन की सरकार बनी तो नियोजित शिक्षकों के समान काम-समान वेतन की मांग को पूरा किया जाएगा. 4 लाख शिक्षकों और उके परिजन के बड़े वोट बैंक पर  विपक्षी दलों ने निगाहें टिका रखी हैं। लगातार इनको लुभाने और उनके वोट अपने पक्ष में करने के दावे किये जा रहे हैं.

बुधवार को नेता प्रतिपक्ष सह राजद नेता तेजस्वी यादव ने शिक्षकों की लम्बे समय से चली आ रही  समान काम समान वेतन की मांग का समर्थन करते हुए घोषणा की जब उनकी सरकार (महागठबंधन सरकार )बनेगी तो शिक्षकों को समान काम समान वेतन की मांग को पूरा किया जाएगा। साथ ही उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि एक दो दिनों में महागठबंधन की साझा घोषणा पत्र इस मुद्दे को भी शामिल किया जाएगा जिसका अभी ब्लू प्रिंट तैयार किया जा रहा है। इस घोषणा के बाद  बिहार में विधान सभा के साथ-साथ विधान परिषद चुनाव को लेकर शिक्षकों के बीच चुनावी पारा चढ़ गया है। विधानपरिषद के शिक्षक व स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव को लेकर भी शिक्षकों में सरगर्मी बढ़ गई है। 


कल के बाद ना सिर्फ हर चौक-चौराहों बल्कि स्कूलों से लेकर शिक्षक संघ के कार्यालयों तक बल्कि शिक्षकों के सोशल मीडिया व वाट्सप ग्रुपों में सिर्फ इसी बात की चर्चा चल रही है। अभी तक तो शिक्षक अपने पंसद और न पसंद के उम्मीदवारों की बात करने से कतराते थे वहीं अब सारे लोग चुनावी चर्चा और गणित बिठाते नजर आ रहे हैं। चूंकि शिक्षकों ने सड़क से लेकर न्यायालय तक लम्बी लड़ाई लड़ी और फिर पिछले दिनों लम्बी चली हड़ताल एवं सरकार के आश्वासन के बाद शिक्षकों के लिए जो सेवा शर्त, वेतन, ईपीएफ आदि देने की घोषणा हुई उससे शिक्षकों में निराशा के साथ साथ आक्रोश भी था। मगर अब तक किसी भी राजनैतिक दल और नेता द्वारा शिक्षकों की मांगों के समर्थन में खड़ा होने और घोषणा नहीं करने से शिक्षक अपने आप को इस चुनाव में अछूता समझ रहे थे और उन्हें कोई विकल्प नहीं नजर आ रहा था। 

मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग शिक्षक है जो आम चुनाव के संचालन से लेकर जीत-हार में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी निभाता है।  सूबे के प्राथमिक से लेकर विश्वविद्यालय स्तर के शिक्षक विधान सभा के साथ साथ विधान परिषद के स्नातक और शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र चुनाव में मत का प्रयोग करेगें और इनका वोट महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सभी चुनाव लगभग एक ही अवधि में होने से मामला दिलचस्प हो गया है। आम मतदाता तो सिर्फ विधान सभा के चुनाव में ही भाग लेगी। वहीं स्नातक मतदाता विधान सभा और विधान परिषद् के स्नातक निर्वाचन के चुनाव में मगर शिक्षक तो विधान सभा के साथ-साथ विधान परिषद् के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन में भी भाग लेंगे यानी उन्हें तीन-तीन मत देने का अधिकार और मौका मिलेगा।विधान सभा और विधान परिषद चुनाव दलीय होने से मामला और दिलचस्प हो गया है।


अब तक राजनीतिक दलों के लिए भले ही शिक्षा व शिक्षक महत्वपूर्ण मुद्दा न रहता हो पर अब विपक्ष द्वारा इस मुद्दे को आगे लाने से विपक्षी नेताओं और उम्मीदवारों को शिक्षकों की गोलबंदी करने में बहुत हद तक मदद मिलेगी। वहीं सत्ताधारी पार्टी और इसके उम्मीदवार लगातार इसकी काट ढूंढने में लगे हैं और सत्ताधारी दल के कईयों ने भी अपने बैनर पोस्टर में भी इस मुद्दे को अपनी प्राथमिकता तक बताते हुए शिक्षकों को लुभाने में जुटे हैं। 

शिक्षाविदों का कहना है कि बिहार की शिक्षा का इतिहास काफी गौरवशाली रहा है। बिहार की पहचान मेधा और परिश्रम से होती है। यहां के मेधावी लोगों ने देश व विदेशों में कई इतिहास रच चुके हैं। मेधा और शिक्षा तभी सुरक्षित और संरक्षित रहेगी जब इसके पोषक और वाहक यानी शिक्षक संतुष्ट और उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा। उनलोगों कहना है कि जब शिक्षक खुद अपने भविष्य को लेकर चिंतित व अनिश्चितता के वातावरण में रहेगा तब वह समाज एवं देश के भविष्य का कैसे निर्माण करेगा। साथ ही वह दूसरे का भविष्य कैसे बेहतर कर सकेगा। 

शिक्षकों का कहना है कि विपक्ष के नेता की घोषणा के बाद हमारी उम्मीदें जरूर बढ़ी है मगर भरोसा नहीं। उनलोगों कहना है कि शिक्षकों ने अब तक सरकार से लेकर शिक्षक के प्रतिनिधियों व शिक्षक संघ के नेतृत्व पर भरोसा ही किया और हमेशा हम सभी के साथ छलावा और धोखा हुआ। इस बार राज्य के सभी कोटि के शिक्षक एकजुट हैं और अपने सम्मान और हक के लिए लोकतांत्रिक ढंग से हम सभी अपनी ताकत दिखाएगें। शिक्षकों का स्पष्ट कहना है कि जो भी राजनैतिक दल हमारी मांगों के प्रति गंभीर और उसे क्रियान्वित करने की माद्दा रखती हो वह अपने लिखित रूप से घोषणा पत्र में शामिल करें। हम सभी शिक्षक भी वादा करते हैं हम और हमारे परिजन उस दल को सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने तक कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। 


अब देखना होगा कि बिहार के नेताजी गुरूजी को लेकर कितने संवेदनशील हैं यह तो उनके चुनावी घोषणा पत्र जारी होने के बाद पता चलेगा। यह बात अलग है कि अभी तक किसी दल ने घोषणा पत्र जारी नहीं किया है। लेकिन विधान सभा के पहले ही विधानपरिषद के चुनाव के कारण इसके उम्मीदवारों को शिक्षक मतदाताओं का काफी विरोध झेलना पड़ रहा है और उम्मीदवारों के दावे और वादे का मतदाताओं पर कोई असर नहीं दिख रहा है। मगर इस बार के विधानपरिषद के साथ साथ विधान सभा चुनाव में शिक्षकों के मत का अहम रोल होगा और उनका रुख और मिजाज क्या गूल खिलाता है यह तो चुनाव परिणाम ही बताएगा। मगर यह तो स्पष्ट है कि शिक्षक इस बार आर पार की मूड में हैं।

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