ओमपुरी को देख जब शबाना ने कहा था कैसे कैसे लोग हीरो बनने चले आते हैं

ओमपुरी को देख जब शबाना ने कहा था कैसे कैसे लोग हीरो बनने चले आते हैं

N4N DESK: हिंदी सिनेमा में फिल्मों का एक ऐसा दौर भी आया था जिसमें देश की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक समस्याओं को पर्दे पर दिखलाने की कोशिश की गई थी. इस दौर में हैंडसम नायकों का बेहतरीन दौरा था.दिलीप कुमार, राजेश खन्ना, देव आनंद, शमी कपुर जैसे कलाकार इस दौर में लोगों के दिलों पर राज करते थे. लेकिन इस दौर में एक ऐसे अभिनेता ने एंट्री की जो देखने में गुड लुकिंग तो नहीं था लेकिन वो अपने जानदार अभिनय के बलबूते रुपहले पर्दे पर खुद का परचम लहराना चाहता था.

चाय की दुकान से सिने सितारे तक का सफर 

ओमपुरी एक साधारण पंजाबी परिवार से आते थे. उनका जीवन बहुत एकाकी रहा क्योंकि बचपन में ही उनकी मां गुजर गई और पिता फौज में थे. मां की मौत के बाद ओमपुरी अंबाला से अपने ननिहाल पटियाला पहुंचे और वहीं पढ़ाई की शुरूआत कर दी. उसके बाद पुणे के भारतीय फिल्म और टेलीवीजन संस्थान से स्नातक की. साल 1973 में वह राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्र भी रहे, जहां अभिनेता नसीरुद्दीन शाह से उनकी मुलाकात हुई. ये बात शायद कम ही लोगों को मालूम होगी की ओमपुरी ने जब पहली नौकरी की थी तो उनके उस 5 रुपये महीना मिल करता था. सात साल की उम्र में चाय की दुकान में काम करने से लेकर भारतीय सिनेमा के मशहूर कलाकार के दर्जे तक पहुंचने वाले ओमपुरी की यात्रा कठिन परिस्थितियों से भरी रही.

ओमपुरी के बॉलीबुड का सफर

किसी चाय की दुकान के अंधेरे कोने से उठकर भारतीय और फिर हॉलीवुड सिनेमा में पहचान बनाने वाले ओमपुरी के लिए सफर बहुत ही मुश्किल भरा सफर रहा. एक ऐसा समय भी आया जब ओमपुरी को फिल्मों में काम करना था, मगर अपने चेहरे पर दाग की वजह से कोई भी इन्हें पसंद नहीं करता था. जब नसीर के साथ ओमपुरी ने इस इंस्टीट्यूट में दाखिला लिया तो फिल्म अभिनेत्री शबाना आजमी ने उन्हें देख मुंह बनाते हुए ये तक कह दिया था कि कैसे-कैसे लोग हीरो बनने चले आते हैं. मगर ओमपुरी ने शबानी आजमी की बात को नजरअंदाज करते हुए खुद की काबिलयत पर भरोसा किया. ओमपुरी ने पर्दे पर अभिनय की शुरुआत विजय तेंदुलकर के मराठी नाटक पर बनी फिल्म “घासीराम कोतवाल ” के साथ की. इसमें किसी ऐसे व्यकि की जरूरत थी जिसके चेहरे पर दाग हो. इस फिल्म के बाद भवनी भवई, स्पर्श, मंडी, आक्रोश, मिर्च मसाला और धारावी जैसी फिल्मों में बेहतर प्रर्दशन कर सभी को दिखा दिया कि रूखे दागदार चेहरे के पीछे एक संवेदनशील और अभिनय को जीने वाला अभिनेता छिपा है.

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