राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि पर मंत्री जीवेश कुमार ने उन्हें दी भावभिनी श्रद्धांजलि

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि पर मंत्री जीवेश कुमार ने उन्हें दी भावभिनी श्रद्धांजलि

 पटना. 24 अप्रैल को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की पुण्यतिथि पर श्रम संसाधन एवं आईटी विभाग के मंत्री जीवेश कुमार ने अपने सरकारी आवास पर राष्ट्रकवि दिनकर को श्रद्धा सुमन अर्पित किया। इस दौरान उन्होंने राष्ट्रकवि दिनकर की कुछ पंक्तियां भी पढ़ीं।

इस अवसर पर मंत्री जीवेश कुमार ने कहा कि हमलोग महाकवि रामधारी सिंह दिनकर के लिखे काव्य-संग्रह 'रश्मिरथी' को पढ़ा करते थे जिसमें 'कृष्ण की चेतावनी', विशेष रूप से हमें प्रिये था। इसे सोशल मीडिया पर अनेक लोगों ने स्वर दिए हैं। इस कविता का लय और भाषा इतना लोकप्रिय है कि जिस-जिसने इसे पढ़ा उसने ख़ूब सराहा। लोगों को ज़ुबानी यह कविता याद है। रश्मिरथी के अलावा महाकवि ने रेणुका, हुंकार, उर्वशी, कुरुक्षेत्र, परशुराम की प्रतीक्षा जैसे संग्रहों के साथ-साथ गद्य भी ख़ूब लिखा। वे अपनी कविता में एक जगह लिखते हैं कि 'मर्त्य मानव की विजय का तूर्य हूँ मैं, उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं।' यह उनकी लिखी उन कालजयी पंक्तियों में से एक है जिसे लोग किसी मुहावरे की तरह प्रयोग करते हैं। यूं तो कवि 'पुरुरवा' के माध्यम से यह पंक्तियां कह रहे हैं परंतु दिनकर शब्द का अर्थ भी सूर्य ही है। रामधारी सिंह दिनकर वाक़ई साहित्य के सूरज हैं, जिसकी रौशनी शब्दों के साथ लोगों के जीवन में रची-बसी है। कितने ही स्थान हैं, जहां महाकवि की पंक्तियां संसद से लेकर जन-आंदोलनों तक की आवाज़ बनीं।

मंत्री जीवेश कुमार ने कहा कि जो जानकारी मुझे है, जेपी आंदोलन में रामधारी सिंह रचित सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। ख़ूब पढ़ा गया। सेना को संबोधित कर हमारे आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पढ़ते हैं कि कलम आज उनकी जय बोल तो महामारी के समय टीकाकरण अभियान पर बात करते हुए वे याद करते हैं कि मानव जब ज़ोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जहां राष्ट्रकवि की पंक्तियों के साथ जनचेतना को जाग्रत करने का प्रयास किया जाता है। आज के समय में जब राजनीति अवसरवादी हो सब को अपनी विचारधारा के खांचे में बिठाना चाहती है, वहीं दिनकर को किसी एक विचार के साथ जोड़ना असंभव है। वे जनवादी कवि हैं, राष्ट्रवादी भी, गांधीवादी भी और मार्क्सवादी भी हैं। वे एक समय गांधी जी के ख़िलाफ़ लिखते हैं तो उनकी मृत्यु के शोक पर भी लिखते हैं। पंडित नेहरू जो उन्हें राज्यसभा ले गए, उन्हीं के ख़िलाफ़ उन्होंने कई कविताएं उसी संसद में खड़े होकर पढ़ीं। इससे मालूम होता है कि वे एक सच्चे कवि थे, जिसे किसी प्रकार का लोभ न था। वे सत्ता के साथ रह कर भी सत्ता के विरुद्ध खड़े हो सकते थे।

एक वाक़या उनसे जुड़ा मशहूर है कि एक बार जब नेहरू के पांव लड़खड़ाए तो दिनकर ने उन्हें पकड़ लिया। नेहरू के आभार व्यक्त करने पर उन्होंने कहा कि, जब-जब राजनीति लड़खड़ाती है, साहित्य ही उसे संभालता है। वास्तव में, उनकी कथनी-कहनी में अंतर न था। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व ही है कि पटना स्टेशन पर उनकी जयंती के दिन उनकी तस्वीर को दर्शाया गया, उनके गांव सिमरिया में स्टेशन की दीवारों पर उनकी लिखी पंक्तियां उकेरी गयी हैं। इसी गांव सिमरिया में उनका जन्म 23 सितम्बर 1908 को हुआ था और 24 अप्रैल 1978 को 65 की आयु में उनका निधन हो गया। 65 की उम्र उनकी देह की थी लेकिन कोई भी साहित्यकार भौतिक सीमाओं के पार भी इस संसार में मौजूद रहता है, अपनी लिखी रचनाओं के माध्यम से। महाकवि रामधारी सिंह दिनकर की भी यह यात्रा अनवरत जारी है। 

दिनकर के लिखे सुभाषित से ही उन्हें नमन: 

मरणोपरान्त जीने की है यदि चाह तुझे,

तो सुन, बतलाता हूँ मैं सीधी राह तुझे,

लिख ऐसी कोई चीज कि दुनिया डोल उठे,

या कर कुछ ऐसा काम, ज़माना बोल उठे।

उक्त अवसर पर अजेंद्र शर्मा, विंध्याचल राय, विजय सिन्हा, देवेन्द्र झा, समाजसेवी नागेन्द्र झा, सब्बु कुमार, संदीप कुमार और अन्य विद्वतजन और गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

Find Us on Facebook

Trending News