POSITIVE NEWS: काले गेहूं ने चमकाई युवा किसानों की जिंदगी, उत्पादन से मिल रहा आर्थिक बल, डायबिटीज के मरीजों के लिए है फायदेमंद

POSITIVE NEWS: काले गेहूं ने चमकाई युवा किसानों की जिंदगी, उत्पादन से मिल रहा आर्थिक बल, डायबिटीज के मरीजों के लिए है फायदेमंद

PATNA: पिछले कुछ सालों से खेती में कई तरह के बदलाव आए हैं. पहले ऐसा माना जाता था कि किसान मजबूरी में खेती करते हैं, लेकिन अब इस सोच में बदलाव आया है. अब युवा भी खेती में हाथ आजमा रहे हैं. युवा अपनी प्रगतिशील सोच के जरिए खेती में उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल कर उसे पहले से ज्यादा लाभदायक और आसान बना रहे हैं. इसी कड़ी में नाम जुड़ा पटना जिले के नौबतपुर के युवा किसान रविरंजन कुमार का, जिन्होनें काले गेहूं की खेती शुरू की है.

पहले काले गेहूं के बारे में कम ही लोग जानते थे या इसकी खेती करना पसंद करते थे, लेकिन इसकी गुणवत्ता और मुनाफे को जानकर पहली बार राजधानी पटना से 30 किलोमीटर दूर नौबतपुर में काले गेहूं की खेती शुरू की गयी है. नौबतपुर प्रखंड के सोना गांव के युवा किसान रवि रंजन कुमार ने इस क्षेत्र में हाथ आजमाया है. उन्होनें करीब दस कट्ठा जमीन में काले गेहूं की खेती की है. इसमें सोशल मीडिया ने उनकी खास मदद की, उन्होनें वहीं से इसके बारे में जानकारी जुटाई औऱ अपने मित्र से भी चर्चा की. इनकी लगन और मेहनत का ही नतीजा है कि अब गांव के कई किसान काले गेहूं की फसल लगाने की तैयारी में जुटे हैं. काले गेहूं के उत्पादन सामान्य गेहूं की तरह ही होता है. इस गेहूं का ना सिर्फ उत्पादन अधिक होता है, बल्कि सेहत के मामले में सामान्य गेहूं से ज्यादा अच्छा होता है. इतना ही नहीं यह किसानों के लिए बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है. बाजार में पंद्रह हजार से सोलह हज़ार रुपये प्रति क्विंटल की दर से इसकी बिक्री होती है, जो सामान्य गेहूं से बहुत ज्यादा है. यदि किसान इस गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर करे तो बेशक अधिक मुनाफा कमा सकते हैं. यह खाने में स्वादिष्ट होने के साथ ही डायबिटीज के मरीजों के लिए काफी लाभदायक होता है.

किसान रवि रंजन ने गेहूं के बारे में बताया कि इस गेहूं की पैदावार 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. इसमें वर्मी कंपोस्ट और डब्ल्यूडीसी खाद का उपयोग किया गया है. गेहूं के इस प्रकार को मोहाली, पंजाब के नेशनल एग्री फूड बॉयोटेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट ने विकसित किया है. रवि रंजन  युवा किसान है जिन्होनें 12वीं पास करने के बाद अपने गांव में ही खेती करना शुरू कर दिया. इसके पहले उन्होंने काले चावल की भी खेती की है. किसानों का कहना है कि बीच- बीच में बाढ़ के कृषि विज्ञान केंद्र वरीय वैज्ञानिक डॉ शारदा कुमारी और वैज्ञानिक डॉ विरणाल वर्मा भी उनके गांव पहुंच कर खेती के बारे में उन्होंने नए तकनीक के बारे बताते हैं और फसलों को देखते भी हैं.

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