फिरकी ले रहे हैं PK ! आखिर चुप्पी को बोलने से बेहतर क्यों मान रहे प्रशांत किशोर?

फिरकी ले रहे हैं PK ! आखिर चुप्पी को बोलने से बेहतर क्यों मान रहे प्रशांत किशोर?

PATNA : चुनावी रणनीतिकार और जेडीयू के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर इन दिनों फिरकी ले रहे हैं। अपने बयानों को लेकर अपनी पार्टी में घिरे प्रशांत किशोर अब चुप्पी को बोलने से बेहतर बता रहे हैं। प्रशांत किशोर ने गुरुवार को महात्मा गांधी के कथन को कोट करते हुए ट्वीट किया जिसमें चुप्पी को बोलने से बेहतर बताया गया है। अब सवाल उठता है कि पीके आखिर कहना क्या चाह रहे हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि अपनी बातों को मुखरता से रखने वाले प्रशांत किशोर अब चुप्पी को अपना हथियार बना रहे हैं?

अपनी ही पार्टी में घिरे पीके

प्रशांत किशोर इन दिनों अपने बयानों को लेकर अपनी ही पार्टी में घिरे बताए जाते हैं। कुछ दिनों पहले मुजफ्फरपुर में प्रशांत किशोर ने कहा था कि वे पीएम-सीएम बना सकते हैं तो फिर मुखिया और सरपंच भी बना सकते हैं। इससे पहले एनडीए के नेताओं के द्वारा शहीद पिंटू सिंह को पटना एयरपोर्ट पर श्रद्धांजलि नहीं दिए जाने पर भी सवाल उठाते हुए उन्होंने ट्वीट कर शहीद के परिजनों से माफी मांगी थी। इतना ही नहीं जब सीएम नीतीश शहीद पिंटू के परिजनों से मिलने और श्रद्धासुमन अर्पित करने बेगूसराय गए थे तो एकबार फिर पीके ने ट्वीट का गुगली फेकते हुए इसे फॉलोअप बताया था। 

कुल मिलाकर पीके के द्वारा कहीं पर निगाहें कहीं पर निशाना की तर्ज पर फिरकी लेते हुए ट्वीट करना पार्टी को असहज कर रहा है। इसी का परिणाम है कि पार्टी के मुखर प्रवक्ता नीरज कुमार ने नहला पर दहला मारते हुए बगैर नाम लिए हुए पीके को नसीहत दे दी थी। नीरज कुमार ने कहा कि लोकतंत्र में जनता नेता बनाती है इसको लेकर किसी को भी भ्रम में नहीं रहना चाहिए। नीतीश कुमार को जनता ने बनाया है।

वहीं दूसरी तरफ पीके के बयानों को लेकर सवाल पूछे जाने पर जेडीयू के महासचिव आरसीपी सिंह ने तो प्रतिक्रिया देना भी जरुरी नहीं समझा। बताया जा रहा है कि प्रशांत किशोर को लेकर पार्टी के कई और नेता भी खफा हैं।

वैसे प्रशांत किशोर इन दिनों 2 लाख युवाओं को पार्टी से जोड़ने में लगे हैं। इसको लेकर वे लगातार अभियान चला रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि इसको लेकर पार्टी के कई स्थापित नेता अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अब देखने वाली बात होगी की जेडीयू के नए और पुराने नेताओं की लड़ाई किस मुकाम तक जाती है।

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