प्रशांत किशोर को बता दिया औकात! मोदी-नीतीश व कांग्रेस के बाद आखिर ममता ने क्यों लिया इतना बड़ा एक्शन

प्रशांत किशोर को बता दिया औकात! मोदी-नीतीश व कांग्रेस के बाद आखिर ममता ने क्यों लिया इतना बड़ा एक्शन

प्रशांत किशोर, एक ऐसा नाम जो हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में गैर राजनीतिक चेहरा होते हुए भी सबसे ज्यादा सुर्खियाँ बटोरने वाला नाम रहा है. लेकिन इस नाम के साथ राजनीतिक दलों और राजनीतिक नुमाइन्दों के बीच तकरार की खबर भी हमेशा से सुर्खियाँ बटोरती रही हैं. वर्ष 2014 के संसदीय चुनाव में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रशांत किशोर उर्फ़ पीके की राष्ट्रीय पहचान बनी लेकिन चुनाव परिणाम के कुछ महीनों बाद ही उनके और मोदी-शाह के बीच दूरियां बढ़ गई. 

महज एक साल बाद वर्ष 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के पहले पीके ने तब के पीएम मोदी के सबसे बड़े प्रतिद्वन्द्वी जदयू के नीतीश कुमार के साथ दोस्ती की और बिहार में नीतीश कुमार सत्तासीन हो गए. कुछ महीनों में ही पीके को जदयू को उपाध्यक्ष तक बना दिया गया. लेकिन, एक बार फिर यहाँ भी पीके का वही हाल हुआ जो मोदी के साथ हुआ था. पीके पर अनावश्यक रूप से जदयू के आंतरिक मामलों में दखल देने, पार्टी नेताओं को दरकिनार करने, अपने निर्णय थोपने के भीतरखाने आरोप लगे. कुछ महीनों बाद ही नीतीश कुमार ने स्थिति असहज होती देख पीके को बाहर का रास्ता दिखाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया. 

अब कुछ यही स्थिति पश्चिम बंगाल में दिख रही है. सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के कई नेताओं को अब पीके का साथ रास नहीं आ रहा है. पीके की रणनीतियों से खफा टीएमसी के वरिष्ठ नेता डेरेक ओ ब्रायन ने हाल ही पीके को पार्टी के अंदरूनी मसलों में दखल न देने का परोक्ष इशारा किया था. उन्होंने जोर देकर कहा कि तृणमूल ने आई-पीएसी को पांच साल के लिए नियुक्त किया है और इसके लिए लक्ष्य निर्धारित हैं। उन्होंने कहा कि आई-पीएसी एक राजनीतिक सहयोगी है और उसे टीएमसी के लिए कुछ कार्य करने हैं लेकिन एजेंसी या उसका कोई भी अधिकारी जरूरी नहीं कि पार्टी की राय को प्रतिबिंबित करे. 


दरअसल विधानसभा चुनाव में टीएमसी की जीत के लिए पीके ने कई सख्त निर्णय लिए थे. इसमें पार्टी के कई मौजूदा विधायकों का टिकट काटना, ग्रासरूट पर काम करने वाले नेताओं को दरकिनार करना और अपनी रणनीति के अनुरूप पार्टी को चलने के लिए मजबूर करने जैसी बातें हुई थी. हाल ही में जब कोलकाता नगर निकाय का चुनाव हुआ तो टीएमसी की जीत से ज्यादा पीके की होने लगी. कहा गया कि इस जीत में भी पीके की रणनीति काम आई. वहीं पार्टी नेता मानते हैं कि जीत का श्रेय सिर्फ पीके को देना ठीक नहीं है. पीके ने भले रणनीति बनाई हो लेकिन जमीन पर जनता को पार्टी से जोड़ने का काम तो नेता ही करते हैं. ऐसे में नेताओं को पार्टी में उचित तरजीह नहीं मिलता उचित नहीं है.

इसी महीने जब पूर्वोत्तर भारत के बड़े राजनीतिक चेहरे और कांग्रेस नेता मुकुल संगमा ने टीएमसी का दामन थामा और गोवा के पूर्व सीएम लुइज़िन्हो फलेरियो भी टीएमसी से जुड़े तो दोनों ने इसके लिए बार बार पीके का आभार जताया. उन्होंने ममता बनर्जी के बदले पीके के कारण टीएमसी से जुड़ने की वहज बताकर कहीं न कहीं से ममता को उनकी ही पार्टी में हाशिए पर धकेलने वाली बात बोल दी. ममता अपनी छवि और लीडरशिप को लेकर हमेशा से सतर्क और सजग रही है. ऐसे में पीके के सामने उनकी छवि का कमतर हो जाना पीके के लिए खतरे की घंटी के बराबर ही माना जाएगा. कुछ इन्हीं वजहों से ममता ने खुद तो नहीं लेकिन अपने खासमखास से पीके को सधे शब्दों में सख्त संदेश जरुर दे दिया है. 

टीएमसी के थिंक टैंक मानते हैं कि पीके का पार्टी में बढ़ता दखल अब कुछ ज्यादा हो गया है. संभवतः इसी कारण से डेरेक ओ ब्रायन ने इशारों इशारों में पीके को अपनी जद में रहने का फरमान सुना दिया है. अब देखना होगा कि पीके को उनकी हैसियत बताकर टीएमसी उन्हें कितने दिनों तक अपने साथ रखती है. या फिर मोदी, नीतीश और अन्य जगहों पर धकियाये जाने के बाद अब पीके कितने दिनों तक ममता की छाँव में रह पाते हैं. फ़िलहाल डेरेक ओ ब्रायन के बयान के बाद जो भविष्य दिख रहा है उसमें हो न हो पीके की राह अलग हो सकती है. 

कई राजनीतिक विशेषज्ञ भी मानते हैं कि पीके हमेशा से खुद को श्रेष्ठ साबित करने की मंशा लेकर काम करते हैं. इसमें पार्टी और अन्य नेता गौण हो जाते हैं और हर चर्चा के केंद्र में पीके रह जाते हैं. स्वाभाविक है पीके को लेकर यह श्रेष्ठता बोध किसी भी नेता को नागवार गुजरता है. इन्हीं कारणों से पहले मोदी फिर नीतीश बाद में कांग्रेस और अब ममता के साथ भी पीके की दूरियां बढ़ जाए तो कोई हैरत की नहीं होगी. 

प्रिय दर्शन शर्मा की रिपोर्ट 

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