BJP नेताओं द्वारा लिखित पुस्तक का विमोचन, RSS के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी हुए शामिल

BJP नेताओं द्वारा लिखित पुस्तक का विमोचन, RSS के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल जी हुए शामिल

PATNA: राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉक्टर कृष्ण गोपाल जी ने आज केशव सरस्वती विद्या मंदिर, पटना में  बिहार भाजपा नेता रमेन्द्र राय और रामनिवास कुमार द्वारा लिखित पुस्तक “सभ्यता के विकास में बिहारी बुद्धिजीवियों का योगदान” का विमोचन किया. पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में हज़ारों की संख्या में पूर्ववर्ती छात्र शामिल हुए।

विद्या भारती के पूर्व राष्ट्रीय महामंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता रमेन्द्र राय ने बताया, “इस पुस्तक को इस पुस्तक को विभिन्न कालों में बांटा गया है, जैसे प्रागैतिहासिक काल, उत्तर वैदिक काल, महाभारत काल, मगध काल, अजातशत्रु काल, सम्राट महापद्मनंद, मौर्यकाल, जैन सभ्यता कालीन, दिल्ली व मुगलिया सल्तनत काल, आधुनिक भारत के निर्माण की भूमिका में बिहारी बुद्धिजीवी. हर काल के दौरान के समय के बिहारी बुद्धिजीवी की चर्चा की गयी है”.

भाजपा नेता और पुस्तक के सह लेखक रामनिवास कुमार ने पुस्तक के बारे में विस्तृत चर्चा करते हुए कहा की “यह पुस्तक विश्व सभ्यता का एक छोटा-सा दस्तावेज है। आज हम जिस बिहार को देख रहे हैं, वह भूमि का टुकड़ा मात्र लग रहा होगा लेकिन इसका अतीत बेहद प्रभावशाली रहा है। इसने विश्व सभ्यता को वो दिया जिसकी आज कल्पना नहीं की जा सकती है। धार्मिक ग्रंथों और मिथकों को यदि छोड़ भी दें, तो ज्ञात दुनिया का सबसे पुराना इतिहास बिहार का है। इसकी शुरूआत ऋगवेद की रचना से प्रारंभ होता है। वैदिक कथा के अनुसार सदानीरा नदी के पूर्व का क्षेत्र दलदल था और उस दलदल को अबाद करने का श्रेय रहुगुणा पुत्र गौतम और विदेह वंशी इक्षवाकु कुल के राजाओं को जाता है।“

वर्तमान बिहार का दक्षिणी भाग का इतिहास रोचक और रामांचकारी रहा है। ज्ञात तथ्यों के आधार पर इस क्षेत्र का उद्भव महाराजा जरासंध के काल से प्रारंभ होता है और ईसा के बाद पांचवीं सताब्दी तक यह क्षेत्र और यहाँ के भूप व नरेशों ने दुनिया को अपने कब्जे में रखा। एक से बढ़ कर एक प्रभावशाली सम्राटों ने अपने बाहुबल से सभ्यता के इतिहास में नए-नए कीर्तिमान स्थापित किए। इन्हीं सम्राटों ने उन महान विज्ञानी, कलाकार एवं शिल्पकारों का पोषण किया, जिन्होंने मानवता के विकास के नए धरातल उपलब्ध कराए। गणित का आधार शून्य है और उस शून्य को खोजकर निकालने वाले गणितज्ञ “आर्यभट्ट” बिहारी थे. आज जिस योग को लेकर दुनिया में जन जागरूकता का पुनरुत्थान हुआ है उसके प्रणेता पतंजली का बिहार के साथ प्रगाढ़ रिश्ता रहा है।

बिहार में मीमांसा दार्शनिकों की लंबी परंपरा रही है। जैनों के अंतिम तीर्थंकर, भगवान महावीर ने अनेकांतवाद का प्रतिपादन किया। इससे पहले दुनिया वैचारिक रूप से असहिष्णु थी। चिंतकों को दूसरे की सोच से कुछ भी लेना-देना नहीं था । पूरी दुनिया को दूसरे के विचारों का सम्मान करना बिहारी चिंतकों ने बताया। महावीर ने कहा शायद यह भी सत्य हो और वह भी सत्य हो। उन्होंने किसी के चिंतन को न तो गलत ठहराया और न ही उसका खंडन किया। इससे पहले इस प्रकार की स्वीकार्यता का दर्शन देखने को नहीं मिलता है। आज जो बौद्ध व जैन दर्शन में आदर्श जीवन मूल्य हमें देखने को मिलतें हैं, उसके प्रणेता बिहारी बुद्धिजीवी थे। इस पुस्तक में इन तथ्यों की विस्तार से व्याख्या प्रस्तुत की गयी है।आधुनिक दुनिया जिस प्रशासनिक ढ़ाचे पर आरूढ़ है, उसका असली व्याख्याकार सम्राट अजातशत्रु का महामात्य आचार्य वस्साकार थे। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आधारशिला आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य ने रखी। आधुनिक युग में उसी चिंतन को फिर से परिभाषित करने का श्रेय हिन्दी के महाकवि रामधारी सिंह दिनकर को जाता है। उन्होंने अपनी कालजयी रचना ‘‘संस्कृति के चार अध्याय’’ में इस चिंतन की नवीन परिकल्पना प्रस्तुत की है।

नगरों की शैली का विकास करने में बिहारी बुद्धिजीवियों का अतुलनीय योगदान रहा है। राजगृह जैसे पांच पहाड़ि़यों से घिरे नगर का निर्माण मयासुर ने किया था, जबकि पाटलीपुत्र के शिल्पकार महागोविन्द थे। ये दोनों बिहार के रहने वाले थे। आधुनिक भारत के समय में पलासी की लड़ाई, बक्सर की लड़ाई, सन 1857 का विद्रोह, स्वत्रंता संग्राम, जेपी आंदोलन, राम मंदिर आंदोलन, इत्यादि के समय के बिहारी द्धिजीवियों के बारे में चर्चा किया गया है. रमेन्द्र राय और रामनिवास कुमार ने ऊपर सभी विषयों पर उल्लेख करते हुए कहा की धर्म, राजनीति, विज्ञान, अर्थशात्र, सस्कृति, कला, संगीत, चित्रकला आदि मानव जीवन के विभिन्न आयामों में बिहारी बुद्धिजीवियों का हस्तक्षेप साफ दिखता है और उनके द्वारा लिखी गयी पुस्तक में इन तमाम विषयों पर विस्तृत विवरण किया गया है।

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